Rajasthan Government News: बेसहारा बच्चों की देखभाल करने वाले कर्मचारी खुद बेसहारा ‘
बाल विकास अधिकारिता विभाग में तीन महीने से वेतन नहीं मिलने का आरोप, त्योहार से पहले परिवारों पर आर्थिक संकट, विभाग और मंत्री कार्यालय से भी नहीं मिला स्पष्ट जवाब’
संवाददाता/द पब्लिक हब
जयपुर। राजस्थान में बेसहारा और जरूरतमंद बच्चों की देखभाल का जिम्मा संभालने वाले बाल विकास अधिकारिता विभाग के कर्मचारी खुद आर्थिक बदहाली से जूझ रहे हैं। मिशन वात्सल्य के तहत कार्यरत कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें करीब तीन महीने से वेतन नहीं मिला है। त्योहार सिर पर है, लेकिन वेतन के अभाव में कर्मचारी अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने तक को लेकर परेशान हैं। कर्मचारियों के मुताबिक, वेतन भुगतान में देरी कोई नई समस्या नहीं है। पिछले कई वर्षों से हर साल तीन से चार बाल अधिकारिता विभाग राजस्थान महीने तक वेतन अटकने की स्थिति बनती है। नियमित सेवाएं देने के बावजूद समय पर पारिश्रमिक नहीं मिलने से कर्मचारियों के सामने घर चलाने का संकट खड़ा हो गया है। ईएमआई से बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित वेतन नहीं मिलने का असर अब कर्मचारियों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। बैंक की किस्तें, मकान का किराया, बच्चों की फीस, इलाज और घरेलू खचों के लिए उन्हें उधार या जमा पूंजी का सहारा लेना पड़ रहा है। सवाल यह है कि बच्चों के संरक्षण और पुनर्वास जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियां निभाने वाले कर्मचारी अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए किसके भरोसे रहें? केंद्र-राज्य के बीच कहां अटका भुगतान? वेतन में देरी की वजह को
स्मार्ट सिटी को बना दिया…
और सबसे बड़ा सवाल यदि काम में कमियां थीं तो ठेकेदार को भुगतान किस आधार पर जारी किया गया ?
इन सवालों के जवाब डिस्कॉम और परियोजना से जुड़े अधिकारियों को सार्वजनिक करने चाहिए। भुगतान की राशि, कार्यादेश, स्वीकृत अनुमान, वास्तविक कार्य और गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट सामने आए बिना वित्तीय पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल खत्म नहीं होंगे।
जांच कमेटी या क्लीन चिट देने की कवायद ?
आरोप हैं कि कार्य की गुणवत्ता और अनियमितताओं को लेकर जांच की प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन निष्पक्ष और विस्तृत स्थल निरीक्षण के बजाय औपचारिकता निभाकर हुआ है तो यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक सवाल है। जांच कमेटी ने किन स्थानों का निरीक्षण किया ? क्या त्रिपोलिया बाजार, हनुमान जी का रास्ता और बापू बाजार में वास्तविक स्थिति का दस्तावेजीकरण किया गया ? क्या फोटोग्राफिक साक्ष्यों का परीक्षण हुआ ? क्या संबंधित ठेकेदार से जवाब मांगा गया ? जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। आखिर जनता के पैसे से हुए काम की जांच
जनता से छिपाई क्यों जाए ?
सवालों के घेरे में ठेकेदार, फिर नए कार्यादेश कैसे ?
स्वास्तिक इन्फ्रा की भूमिका भी अब जांच के दायरे में लाई जानी चाहिए। यदि कंपनी के काम में गंभीर तकनीकी खामियां पाई गई हैं तो उसकी जवाब देही तय होनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित फर्म को आगे नए कार्यादेश किस आधार पर दिए गए। क्या पुराने कार्यों का गुणवत्ता परीक्षण पूरा हुआ था ? क्या कमियों को दुरुस्त कराया गया ? क्या ठेकेदार पर कोई जुर्माना लगाया गया ? क्या अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई हुई? यदि गंभीर अनियमितताओं के बावजूद नए कार्यादेश जारी किए गए हैं तो यह अधिकारियों की निर्णय प्रक्रिया पर बड़ा सवाल है।
हेरिटेज की कीमत पर किसका विकास ?
पहचान उसके बाजा जयपुरलाको पारवान यस ऐतिहासिक पारंपरिक गलियां हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण शहर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिला है। ऐसे शहर में सरकारी परियोजना के नाम पर यदि दीवारों और मेहराबों पर केबलों का जाल बिछता है तो यह केवल निर्माण कार्य की खामी नहीं, बल्कि विरासत संरक्षण की सोच पर भी सवाल है। स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल बजट खर्च करना, ठेके जारी करना और भुगतान करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है सरक्षित, सुव्यवस्थित और नागरिकों के लिए बेहतर शहर बनाना।
बेसहारा बच्चों की देखभाल ..
लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। क्या केंद्र से मिलने वाली राशि समय पर जारी नहीं हो रही? क्या राज्यांश के भुगतान में देरी है या विभागीय स्तर पर बजट और प्रशासनिक प्रक्रिया अटकी हुई है? यदि हर साल यही समस्या सामने आती है, तो स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं निकाला गया?
मंत्री कार्यालय तक नहीं पहुंची समस्या की स्पष्ट जानकारी !
मामले में विभागीय अधिकारियों से संपर्क कर वेतन भुगतान में देरी का कारण जानने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। उपमुख्यमंत्री एवं विभागीय मंत्री दिया कुमारी के कार्यालय के संबंधित ओएसडी से भी संपर्क किया गया। वहां से भी समस्या को लेकर संतोषजनक जानकारी नहीं मिल सकी। बताया गया कि कार्यालय के पास इस संबंध में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह स्थिति विभागीय समन्वय और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। जब कर्मचारियों को महीनों वेतन नहीं मिल रहा है, तो क्या इसकी जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों और मंत्री कार्यालय तक नहीं पहुंची?
1. मिशन वात्सल्य के कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन अब तक क्यों बकाया है?
2. केंद्र और सवाल बरकरार राज्य सरकार के हिस्से की राशि कब जारी हुई?
3.बकाया वेतन कर्मचारियों के खातों में कब तक पहुंचेगा?
4. हर साल होने वाली इस देरी को रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?
5. वेतन भुगतान में लापरवाही के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारियों को अपने वेतन के लिए महीनों इंतजार करना पड़े, तो यह केवल वित्तीय प्रबंधन का मामला नहीं रह जाता। यह उन कर्मचारियों के प्रति व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल भी है। बेसहारा बच्चों को सहारा देने वाले कर्मचारियों के परिवारों को आखिर सहारा कौन देगा?
संस्कृत विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों के…
समीक्षा के बाद संबद्ध महाविद्यालयों के ऐसे अनुमोदन आदेशों और संबंधित कार्यवाहियों को निरस्त करने का निर्णय लिया गया।
आदेश निरस्त, लेकिन जवाबदेही का
विश्वविद्यालय की कार्रवाई के बाद अब कई सवालों के जवाब बाकी हैं। नियमों के विपरीत अनुमोदन जारी होने से पहले प्रशासनिक जांच क्यों नहीं हुई? इन आदेशों के आधार पर चयनित शिक्षकों की स्थिति क्या होगी? संबंधित महाविद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियों पर क्या
प्रभाव पड़ेगा? और सबसे अहम, इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी? विश्वविद्यालय के आदेश में अनुमोदन पत्रों और संबंधित कार्यवाहियों को निरस्त करने की बात है, लेकिन शिक्षकों की व्यक्तिगत नियुक्तियों पर अंतिम निर्णय अथवा आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं की गई है। द पब्लिक हब की खबर का असर अब आधिकारिक कार्रवाई के रूप में सामने है। खबर में उठाए गए अधिकारों की सीमा, विषय विशेषज्ञता और अनुमोदन प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े सवालों के बीच विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों के स्टाफ अनुमोदन आदेश निरस्त कर दिए हैं।
अब असली परीक्षा विश्वविद्यालय प्रशासन की है कि कार्रवाई केवल आदेश निरस्त करने तक सीमित रहेगी या इस पूरी प्रक्रिया में हुई चूक की जवाबदेही भी तय होगी?
बिल्डरों पर रेरा का डंडा…
खरीदारों को राहत सुनिश्चित न हो।
घर खरीदने से पहले रेरा रिकॉर्ड जरूर जांचें: डिफॉल्टर सूची में नाम होना अपने आप में स्थायी ब्लैकलिस्टिंग या आपराधिक दोषसिद्धि नहीं है। प्रत्येक मामले में संबंधित आदेश, उसकी वर्तमान स्थिति, अपील और भुगतान का रिकॉर्ड देखना जरूरी है। फिर भी घर खरीदने वालों के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है। किसी भी परियोजना में पैसा लगाने से पहले
उसका रेरा पंजीकरण, स्वीकृत नक्शे, निर्माण की प्रगति, शिकायतों और प्राधिकरण के आदेशों की स्थिति जांचना जरूरी है। रेरा की असली ताकत डिफॉल्टरों की सूची बनाने में नहीं, बल्कि आदेशों की पालना कराने और खरीदारों को उनका हक दिलाने में है। सवाल यही है कि जब आदेशों की अनदेखी हो रही है और जुर्माना बकाया है, तो जवाबदेही तय करने की अगली कार्रवाई कब होगी?
डिफॉल्टर सूची में दर्ज प्रवर्तक और परियोजनाएं: जुर्माना जमा नहीं कराने की टिप्पणी वाले प्रवर्तक गुलशन रियलटर्स प्राइवेट लिमिटेड भुवाणा, उदयपुर। डीएलबी स्टार -ग्राम मोहनपुरा, जयपुर। विराज बिल्डर्स – मंगल विहार, गोपालपुरा बाईपास, जयपुर। श्री कृष्णा एबोड्स प्राइवेट लिमिटेड मोहन निवास, खंड गांवरी, कोटा। वर्धमान एसोसिएट्स ग्राम बालिता, कोटा। नीमराना एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड ग्राम चोबारा, अलवर। जीवीबी लिमिटेड – रूप विहार, प्रताप नगर, जयपुर। विजन एसोसिएट्स झालामंड, जोधपुर। स्टैनफोर्ड डेवलपर्स जनकसिंहपुरा, अलवर। वेरिटास बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड – विनायक एन्क्लेव, नरसिंहपुरा, जगतपुरा, जयपुर (दो प्रविष्टियां)। ओम स्काई राइज डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड -सैपुरा, सांगानेर, जयपुर। डीसीबी टाउन प्लानर्स प्राइवेट लिमिटेड भिंडर-कानोड़ रोड,उदयपर।






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