NEET PG 2026 News: NEET-PG में बड़ा बदलाव! अब पर्सेंटाइल नहीं, रैंक से मिलेगा मेडिकल PG में दाखिला, सुप्रीम कोर्ट में विशेषज्ञ समिति ने रखी सिफारिश
NEET-PG और NEET-SS की प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव की तैयारी, NMC ने रैंक आधारित मेरिट सिस्टम को दी सैद्धांतिक मंजूरी; खाली सीटों को भरने के लिए फीस और सर्विस बॉन्ड में भी बदलाव की सिफारिश।
नई दिल्ली। मेडिकल की पढ़ाई कर रहे और पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिला लेने की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए एक बड़ा बदलाव सामने आया है। नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-PG) और सुपर स्पेशियलिटी कोर्स (NEET-SS) में दाखिले की मौजूदा व्यवस्था बदल सकती है। अब तक इन परीक्षाओं में दाखिले के लिए पर्सेंटाइल आधारित क्वालिफाइंग सिस्टम लागू था, लेकिन अब इसकी जगह रैंक आधारित मेरिट सिस्टम लाने की तैयारी की जा रही है। इस प्रस्ताव को लेकर नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
यह जानकारी केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई 12 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में सामने आई है। समिति ने मेडिकल पीजी प्रवेश और काउंसलिंग प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इनमें पर्सेंटाइल सिस्टम को समाप्त कर केवल रैंक के आधार पर मेरिट तैयार करना प्रमुख है। हालांकि, अभी इस संबंध में अंतिम नियम जारी नहीं हुए हैं। NMC जल्द ही प्रस्तावित नियमों का ड्राफ्ट जारी कर संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां मांग सकता है।
पर्सेंटाइल सिस्टम की जगह आएगी रैंक आधारित व्यवस्था
वर्तमान व्यवस्था में NEET-PG और NEET-SS के परिणाम में उम्मीदवारों को पर्सेंटाइल के आधार पर क्वालिफाइंग घोषित किया जाता है। इसके बाद अलग-अलग श्रेणियों के लिए निर्धारित कटऑफ के अनुसार काउंसलिंग में भाग लेने की पात्रता तय होती है। कई बार मेडिकल सीटें खाली रहने पर सक्षम प्राधिकरण द्वारा क्वालिफाइंग कटऑफ में कमी की जाती है।
नई प्रस्तावित व्यवस्था में उम्मीदवारों को पर्सेंटाइल के बजाय रैंक के आधार पर स्थान दिया जाएगा। समिति के अनुसार, नई व्यवस्था लागू होने पर परिणाम में पर्सेंटाइल अंक घोषित नहीं किए जाएंगे, बल्कि उम्मीदवारों की रैंक जारी की जाएगी। इससे प्रवेश प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने और काउंसलिंग में होने वाली देरी कम करने में मदद मिल सकती है।
कटऑफ में भारी गिरावट के बाद बढ़ा विवाद
NEET-PG 2025 की काउंसलिंग के दौरान क्वालिफाइंग कटऑफ में की गई भारी कमी को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। सामान्य वर्ग के लिए क्वालिफाइंग अंक 276 से घटाकर 103 कर दिए गए थे, जबकि SC, ST और OBC श्रेणियों के लिए यह सीमा 235 से घटाकर माइनस 40 तक पहुंच गई थी।
इसी फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कटऑफ में इतनी बड़ी कमी पर सवाल उठाए। याचिकाकर्ता की ओर से भी दलील दी गई कि कटऑफ घटाने के फैसले के पीछे पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
विशेषज्ञ समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मेडिकल पीजी शिक्षा के न्यूनतम मानकों से समझौता नहीं होना चाहिए। केवल खाली सीटें भरने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को प्रवेश की पात्रता देना उचित नहीं है, जिनका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा हो या जिनके अंक नकारात्मक हों।
खाली मेडिकल सीटों को भरने के लिए फीस में बदलाव का सुझाव
समिति ने अपनी रिपोर्ट में केवल परीक्षा प्रणाली ही नहीं, बल्कि मेडिकल कॉलेजों में खाली रह जाने वाली पीजी सीटों की समस्या पर भी ध्यान दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, नॉन-क्लिनिकल पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने के लिए उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इन कोर्स की फीस कम करने पर विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावा प्री-क्लिनिकल और पैरा-क्लिनिकल विषयों में सीट स्वीकार करने वाले उम्मीदवारों को सर्विस बॉन्ड से छूट देने का सुझाव भी दिया गया है। समिति का मानना है कि इससे इन विषयों की खाली सीटों को भरने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट में क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल शाखाओं के रेजिडेंट डॉक्टरों के बीच स्टाइपेंड के अंतर का अध्ययन करने और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देने वाले डॉक्टरों को प्रोत्साहन देने की जरूरत भी बताई गई है।
काउंसलिंग प्रक्रिया को डिजिटल बनाने पर जोर
मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) ने प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। नई व्यवस्था में उम्मीदवारों के लिए ‘फ्रीज’ और ‘फ्लोट’ विकल्प भी शामिल किए गए हैं। फ्रीज विकल्प में उम्मीदवार अपनी आवंटित सीट बरकरार रख सकता है, जबकि फ्लोट विकल्प चुनने पर वह सीट स्वीकार करने के साथ बेहतर विकल्प के लिए अपग्रेडेशन का अवसर भी बनाए रख सकता है।
समिति ने सीट ब्लॉक करने की समस्या को भी खाली सीटों का एक प्रमुख कारण बताया है। इसे रोकने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी तकनीक अपनाने का सुझाव दिया गया है। वहीं, बार-बार अतिरिक्त काउंसलिंग राउंड आयोजित करने से बचने की बात भी कही गई है, क्योंकि इससे पूरी प्रवेश प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
क्या छात्रों को मिलेगा फायदा?
रैंक आधारित व्यवस्था लागू होने पर मेडिकल पीजी प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव जरूर आएगा, लेकिन इससे सीटों की खाली रहने की समस्या पूरी तरह समाप्त होगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि नई व्यवस्था में न्यूनतम योग्यता के मानक किस तरह निर्धारित किए जाएंगे।
फिलहाल NMC के प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। ड्राफ्ट नियम जारी होने और उन पर सुझाव मिलने के बाद ही स्पष्ट होगा कि नई व्यवस्था कब से लागू होगी। ऐसे में NEET-PG और NEET-SS की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए आने वाले समय में यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।






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