Odisha Diwali Tradition: दिवाली पर लक्ष्मी पूजा से पहले पूर्वजों को दी जाती है विदाई, जानिए क्या है ‘बड़ बड़ुआ डाका’ की अनोखी परंपरा
ओडिशा में दिवाली की रात जलाई जाती हैं जूट की लकड़ियां, आसमान की ओर उठाकर पूर्वजों को दी जाती है रोशनी से विदाई; सदियों पुरानी परंपरा का है खास धार्मिक महत्व।
द पब्लिक हब | धर्म एवं संस्कृति डेस्क
नई दिल्ली। दिवाली का त्योहार आते ही घरों में दीपों की रोशनी, मिठाइयों की खुशबू और पूजा-पाठ का माहौल बन जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस त्योहार को मनाने के तरीके भी अलग-अलग हैं। कहीं मां लक्ष्मी की पूजा होती है, तो कहीं मां काली की आराधना और कहीं दीपदान की विशेष परंपरा निभाई जाती है। लेकिन ओडिशा में दिवाली से जुड़ी एक ऐसी अनोखी परंपरा है, जो इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है। यहां मां लक्ष्मी की पूजा से पहले परिवार के दिवंगत बुजुर्गों और पूर्वजों को याद कर उन्हें विदाई दी जाती है। इस रस्म को ‘बड़ बड़ुआ डाका’ कहा जाता है।
इस परंपरा में परिवार के लोग सूखी जूट की लकड़ियां जलाकर आसमान की ओर रोशनी करते हैं और अपने पूर्वजों के लिए प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि इस प्रकाश के जरिए पितरों को उनके लोक लौटने का रास्ता दिखाया जाता है।
क्या है ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ परंपरा?
‘बड़ बड़ुआ डाका’ ओडिशा की एक पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। ओड़िया भाषा में ‘बड़ बड़ुआ’ का अर्थ परिवार के दिवंगत बुजुर्गों या पूर्वजों से है, जबकि ‘डाका’ का अर्थ पुकारना या बुलाना होता है।
इस रस्म में परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। दिवाली की शाम घर के आंगन या मुख्य दरवाजे पर परिवार का सबसे बड़ा सदस्य सूखी जूट की लकड़ियों का गट्ठर लेकर खड़ा होता है। इन लकड़ियों को जलाकर मशाल जैसी रोशनी पैदा की जाती है।
इसके बाद जलती हुई लकड़ी को आसमान की ओर उठाकर पूर्वजों के लिए प्रार्थना की जाती है। यह दृश्य ओडिशा के कई इलाकों में दिवाली की रात देखने को मिलता है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर के आसपास भी इस परंपरा का विशेष महत्व है।
क्यों जलाते हैं जूट की लकड़ियां?
इस रस्म में इस्तेमाल होने वाली जूट के पौधे की सूखी डंडियों को ‘कौन्रिया काठी’ कहा जाता है। इन्हें जलाने पर तेज रोशनी निकलती है, जो अंधेरे में मशाल की तरह दिखाई देती है।
परंपरा के अनुसार, इस रोशनी को आसमान की ओर उठाकर पूर्वजों को उनके लौटने का मार्ग दिखाया जाता है। यह केवल दीप जलाने की रस्म नहीं, बल्कि अपने परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता जताने का प्रतीक भी है।
इस दौरान परिवार के सदस्य सामूहिक रूप से प्रार्थना करते हैं। इस तरह यह परंपरा परिवार के लोगों को अपनी जड़ों और पूर्वजों से जोड़ने का काम करती है।
दिवाली पर पूर्वजों को क्यों दी जाती है विदाई?
ओडिशा में प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, दिवाली से पहले आने वाले पखवाड़े में पूर्वज पितृलोक से धरती पर अपने परिवार के बीच आते हैं। माना जाता है कि वे इस दौरान अपने घर और परिवार के लोगों के आसपास रहते हैं।
अमावस्या की अंधेरी रात में उन्हें वापस पितृलोक जाने के लिए रोशनी दिखाई जाती है। इसी वजह से दिवाली पर मां लक्ष्मी का स्वागत करने से पहले पूर्वजों को सम्मानपूर्वक विदाई देने की परंपरा निभाई जाती है।
यह मान्यता परिवार और पूर्वजों के बीच आध्यात्मिक संबंध को दर्शाती है। हालांकि, यह धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपरा का हिस्सा है।
देश के अलग-अलग राज्यों में दिवाली मनाने के अलग तरीके
भारत की सांस्कृतिक विविधता दिवाली के त्योहार में भी दिखाई देती है। उत्तर भारत में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा प्रमुख होती है। पश्चिम बंगाल में इसी समय काली पूजा का विशेष महत्व है। गुजरात में दिवाली के दौरान चोपड़ा पूजन और नए बही-खातों की शुरुआत की जाती है। तमिलनाडु में भी दिवाली से जुड़ी कई पारंपरिक धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं।
वहीं ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ परंपरा इस त्योहार को एक अलग भावनात्मक और आध्यात्मिक पहचान देती है।
परंपरा में छिपा है परिवार और संस्कृति से जुड़ाव का संदेश
आज के दौर में जब त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, तब ओडिशा की यह परंपरा पूर्वजों को याद करने और पारिवारिक विरासत को सम्मान देने का संदेश देती है। यह बताती है कि दिवाली केवल रोशनी और खुशियों का त्योहार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, रिश्तों और सांस्कृतिक पहचान को याद करने का अवसर भी है।
निष्कर्ष: ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ रस्म भारतीय संस्कृति की विविधता का खूबसूरत उदाहरण है। जहां देशभर में दिवाली पर दीप जलाकर खुशियों का स्वागत किया जाता है, वहीं ओडिशा में पहले अपने पूर्वजों को याद कर उन्हें रोशनी के साथ विदाई दी जाती है। यही अनोखी परंपरा इस राज्य की दिवाली को खास बनाती है।









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