राजस्थान में सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती-2021 को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने वर्ष 2021 की परीक्षा प्रक्रिया में रही गंभीर खामियों को उजागर करते हुए इसे ‘शुचिता पर आंच’ करार दिया है। कोर्ट की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब प्रदेश में नई एसआई भर्ती-2025 की परीक्षाएं आयोजित हो रही हैं, जो सिस्टम के लिए एक बड़े सबक के रूप में देखी जा रही हैं।
प्रबंधन की विफलता: “जब फोटो ही साफ नहीं, तो पहचान कैसी?”
हाईकोर्ट ने आरपीएससी (RPSC) द्वारा जारी प्रवेश पत्रों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एडमिट कार्ड पर अभ्यर्थियों की तस्वीरें ही स्पष्ट नहीं थीं, तो ‘डमी कैंडिडेट’ को रोकना असंभव था।
- सुरक्षा नदारद: कोर्ट ने नोट किया कि केंद्रों पर न तो बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन था और न ही जैमर लगाए गए थे।
- वीडियोग्राफी का अभाव: प्रभावी वीडियोग्राफी की कमी के कारण एसओजी (SOG) को जांच के लिए पर्याप्त रिकॉर्ड तक नहीं मिल सके। इंटरनेट बंद न करना भी इस संगठित अपराध को बढ़ावा देने का बड़ा कारण बना।
कालेर और जगदीश गैंग का ‘सोशल नेटवर्क’
एसओजी की जांच का हवाला देते हुए अदालत ने बताया कि किस तरह संगठित गिरोहों ने परीक्षा को दूषित किया:
- बीकानेर कनेक्शन: मैट्रिक्स कोचिंग इंस्टीट्यूट के राजाराम ने प्रश्न पत्र की तस्वीरें खींचकर ‘कालेर गैंग’ को भेजीं।
- जयपुर कनेक्शन: रवींद्र बाल भारती स्कूल से लीक हुआ पेपर ‘जगदीश गैंग’ तक पहुंचा।
- अनियंत्रित प्रसार: सोशल मीडिया के जरिए पेपर इस कदर सर्कुलेट हुआ कि अब यह पता लगाना नामुमकिन है कि इसका लाभ कितने अनगिनत उम्मीदवारों तक पहुंचा। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि दागी और बेदाग उम्मीदवारों को अलग करना अब संभव नहीं है।
नकल विरोधी कानून: 2021 बनाम वर्तमान (2026)
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कानून के कड़े होते स्वरूप को भी रेखांकित किया है, जो अपराधियों के लिए अब ‘काल’ बन चुका है:
| विशेषता | वर्ष 2021 की स्थिति | वर्तमान कानून (2023-26) |
| अधिकतम सजा | मात्र 3 वर्ष की जेल | आजीवन कारावास (उम्रकैद) |
| जुर्माना | सामान्य जुर्माना | 10 लाख से 10 करोड़ रुपये |
| संपत्ति कुर्की | कोई प्रावधान नहीं था | अपराध से अर्जित संपत्ति की कुर्की/अधिग्रहण |
| जांच अधिकारी | कोई भी रैंक | न्यूनतम एडिशनल एसपी (Add. SP) |
SOG की विरोधाभासी रिपोर्ट और कोर्ट का निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने एसओजी की दो अलग-अलग रिपोर्टों पर भी टिप्पणी की। पहली रिपोर्ट में जांच एजेंसी ने कहा था कि दागी अभ्यर्थियों को अलग करना मुश्किल है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में इसकी संभावना जताई। हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक बार पेपर सोशल मीडिया पर आ गया, तो उसकी पहुंच की सीमा तय करना असंभव है।
