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Home - शिक्षा विभाग - झुंझुनूं से गूंजी लड़ाई की हुंकार: सरकार को 7 दिन का अल्टीमेटम, मांग पूरी नहीं हुई तो आमरण अनशन पर बैठेंगे शिक्षा अधिकारी

शिक्षा विभागझुंझुनूं

झुंझुनूं से गूंजी लड़ाई की हुंकार: सरकार को 7 दिन का अल्टीमेटम, मांग पूरी नहीं हुई तो आमरण अनशन पर बैठेंगे शिक्षा अधिकारी

By The Public Hub
Last updated: June 3, 2026
5 Min Read

झुंझुनूं। देश और राज्य में होने वाले आम चुनाव, राष्ट्रीय जनगणना, बोर्ड परीक्षाएं और सरकार के तमाम बड़े व संवेदनशील अभियानों को अग्रिम मोर्चे पर रहकर सफलतापूर्वक निभाने वाले शिक्षक और शिक्षा अधिकारी आज अपने ही वैधानिक अधिकारों के लिए प्रशासनिक चौखट पर जद्दोजहद करने को मजबूर हैं। राजस्थान में वर्ष 2015 से 2020 के बीच पदोन्नत (Promoted) हुए प्रिंसिपल्स की ‘चयन तिथि अंकन’ का कार्य पिछले कई वर्षों से ठप पड़ा है, जिससे सूबे के करीब 8,000 प्रिंसिपल्स का भविष्य अधर में लटका हुआ है। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर शिक्षा अधिकारियों के प्रमुख संगठन ‘रेसा-पी’ (RESA-P) के बैनर तले अधिकारियों ने जिला कलेक्टर झुंझुनूं को मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव और माध्यमिक शिक्षा निदेशक के नाम एक कड़ा ज्ञापन सौंपा है।

Contents
सालाना इंक्रीमेंट और सेवा लाभों से वंचित हैं 8 हजार प्रिंसिपलजटिल प्रक्रिया का हवाला दे रहा विभाग, संगठन का तीखा पलटवार7 दिन का अल्टीमेटम: 8 जून को धरना, फिर आमरण अनशन की तैयारी

सालाना इंक्रीमेंट और सेवा लाभों से वंचित हैं 8 हजार प्रिंसिपल

शिक्षा अधिकारियों का दर्द है कि चयन तिथि अंकन की इस सुस्त कछुआ चाल के कारण प्रदेश के करीब 8 हजार प्रमोटेड प्रिंसिपल्स को मिलने वाले सालाना इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) सहित कई अन्य महत्वपूर्ण वित्तीय और सेवा लाभ सालों से रुके पड़े हैं। संगठन के पदाधिकारियों ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि इस विषय में खुद शिक्षा मंत्री और शिक्षा सचिव कई बार फाइल आगे बढ़ाने और त्वरित निस्तारण के आदेश जारी कर चुके हैं। इसके बावजूद माध्यमिक शिक्षा निदेशालय (बीकानेर) के डीपीसी (DPC) अनुभाग में बैठे निचले स्तर के अधिकारियों और बाबूओं की लापरवाही तथा हठधर्मिता के कारण यह काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। उच्च स्तर से हरी झंडी मिलने के बाद भी धरातल पर क्रियान्वयन न होना गंभीर प्रशासनिक उदासीनता और संकीर्ण कार्यशैली का जीता-जागता उदाहरण है।

जटिल प्रक्रिया का हवाला दे रहा विभाग, संगठन का तीखा पलटवार

जब इस लेत-लतीफी को लेकर शिक्षा विभाग के प्रशासनिक अमले से बात की गई, तो विभाग का अपना तर्क है। अधिकारियों का कहना है कि 2015 से 2020 के बीच पदोन्नत हुए प्रिंसिपल्स के सर्विस रिकॉर्ड, सेवा अभिलेखों और वरिष्ठता सूची का मिलान व विस्तृत परीक्षण करना एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए अतिरिक्त समय और मानव संसाधन की दरकार है। इसी वजह से 2015 से पहले और 2020 के बाद के मामलों का निस्तारण तो हो गया, लेकिन बीच के ये 5 साल तकनीकी कारणों से अटक गए हैं।

विभाग के इस ढुलमुल रवैये पर रेसा-पी के पदाधिकारियों ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि कार्य बड़ा और जटिल हो सकता है, लेकिन इतना भी बड़ा नहीं है कि इसके नाम पर हजारों वरिष्ठ अधिकारियों को वर्षों तक उनके बुनियादी अधिकारों से ही महरूम कर दिया जाए। संगठन ने सवाल उठाया कि जब शिक्षा विभाग देश के सबसे बड़े काम जैसे चुनाव और जनगणना चुटकियों में करवा सकता है, तो अपने ही कर्मियों के हक के लिए विशेष टास्क फोर्स या अतिरिक्त स्टाफ लगाकर इसका निस्तारण क्यों नहीं कर सकता?

7 दिन का अल्टीमेटम: 8 जून को धरना, फिर आमरण अनशन की तैयारी

रेसा-पी संगठन ने अब सरकार और निदेशालय के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। संगठन ने जिला प्रशासन के माध्यम से चेतावनी दी है कि यदि आगामी 7 दिनों के भीतर चयन तिथि अंकन की प्रक्रिया को युद्धस्तर पर शुरू नहीं किया गया, तो 8 जून से राज्यभर में जिला स्तर पर एक दिवसीय सांकेतिक धरना प्रदर्शन किया जाएगा।

इसके बाद भी यदि सोई हुई सरकार नहीं चेती, तो ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद जैसे ही नए सत्र में विद्यालय खुलेंगे, प्रभावित प्रिंसिपल्स बेमियादी धरने और आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। संगठन की मुख्य मांग है कि सरकार तुरंत इस विसंगति को दूर करने के लिए विशेष अभियान चलाए, डीपीसी अनुभाग में अतिरिक्त स्टाफ नियुक्त करे और प्राथमिकता के आधार पर चयन तिथि अंकित कर प्रभावित प्रिंसिपल्स को उनके रुके हुए वित्तीय लाभ जारी करे।

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