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Home - अपराध - संगठित अपराध’ के लिए ‘सतत अवैध गतिविधि’ जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट ने तय की भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 की सीमाएं

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संगठित अपराध’ के लिए ‘सतत अवैध गतिविधि’ जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट ने तय की भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 की सीमाएं

By The Public Hub
Last updated: May 20, 2026
6 Min Read

जोधपुर। साइबर अपराध और संगठित अपराध (Organised Crime) के मामलों में पुलिस द्वारा लगाई जाने वाली गंभीर धाराओं को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल एक आपराधिक घटना या कुछ लोगों के एक साथ मिलकर अपराध करने भर से किसी मामले को “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम” नहीं माना जा सकता।

नए आपराधिक कानून ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 111 की विस्तृत व्याख्या करते हुए जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने कहा कि संगठित अपराध साबित करने के लिए “सतत अवैध गतिविधि” (Continuing unlawful activity), पूर्व से सक्रिय आपराधिक सिंडिकेट और पिछले 10 वर्षों में एक से अधिक चार्जशीट जैसी कानूनी शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है। यह अहम फैसला श्रीगंगानगर के विनय बघला, हंसराज और प्रशांत सोनी द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला श्रीगंगानगर के पुरानी आबादी थाना क्षेत्र में दर्ज एक बड़े साइबर फ्रॉड केस से जुड़ा है। पुलिस को 2 नवंबर 2024 को सूचना मिली थी कि कुछ लोग दूसरों के बैंक खातों, एटीएम कार्ड और चेक बुक का इस्तेमाल कर साइबर ठगी की रकम निकाल रहे हैं। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए विनय बघला को गिरफ्तार किया और उसके पास से कई बैंक दस्तावेज बरामद किए।

पुलिस जांच में आरोप लगाया गया कि यह गिरोह साइबर फ्रॉड की रकम को विभिन्न खातों में घुमाकर क्रिप्टोकरेंसी (USDT) के लेनदेन में इस्तेमाल करता था। इसी आधार पर पुलिस ने आरोपियों पर BNS की धारा 111 (संगठित अपराध) सहित कई गंभीर धाराएं लगा दीं और ट्रायल कोर्ट ने भी इन्हीं धाराओं में आरोप तय कर दिए।

याचिकाकर्ताओं की दलील: ‘एक घटना से सिंडिकेट नहीं बनता’

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता एस.आर. गोदारा ने पैरवी की। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार के BNS की धारा 111 के तहत आरोप तय कर दिए हैं। पुलिस ने केवल एक FIR और एक कथित घटना के आधार पर यह गंभीर धारा लगा दी है। कानून के अनुसार ‘ऑर्गेनाइज्ड क्राइम’ के लिए पिछले 10 सालों में एक से अधिक चार्जशीट का होना और उस पर सक्षम अदालत का संज्ञान होना जरूरी है। यदि हर सामूहिक अपराध या साइबर ठगी में धारा 111 लगा दी गई, तो सामान्य आपराधिक कानून और संगठित अपराध कानून के बीच का फर्क ही खत्म हो जाएगा।

सरकार का पक्ष: ‘आर्थिक लाभ के लिए सुनियोजित अपराध’

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक एस.आर. चौधरी ने अदालत को बताया कि आरोपियों से बरामद दस्तावेज साबित करते हैं कि वे सुनियोजित तरीके से साइबर ठगी का पैसा क्रिप्टोकरेंसी के जरिये ठिकाने लगा रहे थे। सरकार ने तर्क दिया कि आरोप तय करने के चरण में सबूतों की विस्तृत जांच जरूरी नहीं है। साइबर अपराध अब संगठित रूप ले चुके हैं, इसलिए BNS की धारा 111 का उपयोग ऐसे गंभीर और संरचित आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाने के लिए किया गया है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: “ट्रायल कोर्ट ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं”

जस्टिस फरजंद अली ने अपने 65 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आरोप तय करते समय निचली अदालतें पुलिस की चार्जशीट को यांत्रिक तरीके से स्वीकार कर ‘पोस्ट ऑफिस’ की तरह काम नहीं कर सकतीं। यह अदालत का दायित्व है कि वह न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए देखे कि आरोपित अपराध के कानूनी तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हैं या नहीं। बिना पर्याप्त आधार के गंभीर धाराएं लगाना किसी व्यक्ति को बेवजह कठोर दंड प्रक्रिया में धकेलने जैसा है।

BNS की धारा 111 की पहली विस्तृत व्याख्या

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पहली बार BNS की धारा 111 की गहराई से व्याख्या की। अदालत ने साफ किया:

  • “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम सिंडिकेट” का अर्थ महज दो या अधिक लोगों का साथ होना नहीं है, बल्कि समूह का पहले से संगठित होना और लगातार अवैध गतिविधियों में शामिल होना जरूरी है।
  • धारा 111 लागू करने के लिए ‘सतत अवैध गतिविधि’ साबित होनी चाहिए, जिसके लिए 10 साल में एक से अधिक चार्जशीट दाखिल होना आवश्यक है।
  • संगठित अपराध कानूनों का उद्देश्य गंभीर और लगातार चलने वाले आपराधिक नेटवर्क को तोड़ना है, न कि हर आम मामले में कठोर धाराएं जोड़ना।

कानूनी जानकारों का मानना है कि राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में साइबर फ्रॉड और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में एक बड़ी नज़ीर साबित होगा। इससे पुलिस द्वारा बिना पर्याप्त आपराधिक इतिहास के BNS की धारा 111 के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हो सकेगी।

TAGGED:BNS Section 111Continuing Unlawful ActivityCyber FraudJustice Farjand AliLegal News IndiaOrganised CrimeRajasthan High CourtSri Ganganagar PoliceUSDT Cryptocurrency Fraud
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