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जयपुरकानून

हाईकोर्ट ने कहा- दिव्यांगता जांच के लिए बार-बार नहीं बुला सकते; पुनर्मूल्यांकन के बाद फिर से बुलाना गलत

By The Public Hub
Last updated: April 12, 2026
4 Min Read

राजस्थान में दिव्यांग आरक्षण कोटे के तहत फर्जी सर्टिफिकेट से सरकारी नौकरी हासिल करने वालों के खिलाफ चल रही एसओजी (SOG) की बड़ी जांच के बीच हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभागीय निर्देश पर यदि एक बार दिव्यांगता का पुनर्मूल्यांकन हो चुका है, तो संबंधित व्यक्ति को बार-बार जांच के लिए बुलाना उचित नहीं है।

Contents
न्यायालय की सख्त टिप्पणी: कर्तव्य और मर्यादा के बीच संतुलनक्या था पूरा मामला? (कुलदीप चौधरी बनाम राज्य सरकार)एसओजी की जांच और कानूनी स्थितिपुलिस कार्रवाई और सिविल रिट पर कोर्ट का रुखद पब्लिक हब विश्लेषण: अब क्या होगा आगे?

न्यायालय की सख्त टिप्पणी: कर्तव्य और मर्यादा के बीच संतुलन

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने कुलदीप चौधरी की याचिका को निस्तारित करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने अपने आदेश में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया:

  • सरकार का कर्तव्य: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWD)-2016 के तहत सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून का दुरुपयोग रोके।
  • बार-बार जांच पर रोक: यदि विभाग के निर्देश पर पहले ही विकलांगता का आकलन किया जा चुका है, तो व्यक्ति को बार-बार पुनर्मूल्यांकन के लिए उपस्थित होने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
  • निष्पक्षता की मांग: सरकार को अपनी जांच प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए।

क्या था पूरा मामला? (कुलदीप चौधरी बनाम राज्य सरकार)

यह कानूनी विवाद याचिकाकर्ता कुलदीप चौधरी के माध्यम से कोर्ट पहुँचा। मामले के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:

  1. कैटेगरी: कुलदीप चौधरी को ‘लो विजन’ (Low Vision) कैटेगरी के तहत 60% विकलांगता का प्रमाण पत्र मिला था।
  2. विभागीय पुष्टि: विभागीय मेडिकल बोर्ड ने पहले ही उसका पुनर्मूल्यांकन किया था और उसकी विकलांगता को निर्धारित मानक (40% से अधिक) के अनुसार सही पाया था।
  3. विवाद का कारण: इसके बावजूद, एक नई शिकायत के आधार पर एसओजी ने उसे फिर से नोटिस जारी कर पुनर्मूल्यांकन के लिए उपस्थित होने का निर्देश दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

सरकार का पक्ष: सरकारी वकील ने तर्क दिया कि राज्य को किसी भी अभ्यर्थी की विकलांगता का दोबारा आकलन करने का पूर्ण अधिकार है और विभागीय शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता।


एसओजी की जांच और कानूनी स्थिति

जांच का विषयवर्तमान स्थिति
निशाने पर भर्तियांप्रदेश की कुल 10 प्रमुख सरकारी भर्तियां।
दर्ज मामले44 अभ्यर्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ FIR।
शिकायतों का आधारएसओजी हेल्पलाइन पर मिली 27 गंभीर शिकायतें।
जांच का परिणामकई अभ्यर्थियों की विकलांगता जांच में 40% से कम पाई गई।

पुलिस कार्रवाई और सिविल रिट पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति ने RPWD अधिनियम के तहत सर्टिफिकेट लिया है और पुनर्मूल्यांकन के बाद भी उसे परेशान किया जाता है, तो वह उस कार्रवाई को रद्द करने का अधिकार रखता है। हालांकि, कोर्ट ने एक तकनीकी पक्ष साफ किया:

“चूंकि यह एक सिविल रिट है, इसलिए इसमें चल रही पुलिस (SOG) कार्रवाई पर रोक लगाना संभव नहीं है। यदि शिकायत फर्जीवाड़े की है, तो पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है।”

द पब्लिक हब विश्लेषण: अब क्या होगा आगे?

हाईकोर्ट का यह आदेश सरकार के लिए एक आईना है। एक ओर जहाँ एसओजी को फर्जीवाड़े की जड़ तक पहुँचना है, वहीं दूसरी ओर विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे वास्तविक दिव्यांगों को जांच के नाम पर मानसिक प्रताड़ना न दें। 44 एफआईआर और 10 भर्तियों की यह जांच अब और अधिक सटीक और साक्ष्य-आधारित होनी चाहिए, न कि केवल शिकायतों के आधार पर बार-बार बुलावे वाली।

TAGGED:Fake Disability CertificateGovernment JobsJustice Ashok Kumar JainRajasthan High CourtSOG Investigation
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