जयपुर: राजस्थान की भजनलाल सरकार जहाँ एक ओर भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर महकमे के रसूखदार अधिकारी इस नीति को खुलेआम ठेंगा दिखा रहे हैं। ‘द पब्लिक हब’ के पास मौजूद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की एफआईआर संख्या 73/2026 एक ऐसे ‘महाघोटाले’ की तस्दीक करती है, जिसमें मुख्य किरदार रहे अधिकारी को दंडित करने के बजाय इनाम स्वरूप अजमेर डिस्कॉम (Ajmer Discom) का एमडी बना दिया गया। हम बात कर रहे हैं के.पी. वर्मा की, जो जयपुर डिस्कॉम में ‘निदेशक तकनीकी’ के पद पर रहते हुए करोड़ों के दो अलग-अलग भ्रष्टाचार के प्रकरणों में प्रथम दृष्टया लिप्त पाए गए हैं।

एसीबी और विभागीय जांच में ‘दोषी’, फिर भी कुर्सी सुरक्षित?
हैरानी की बात यह है कि के.पी. वर्मा के खिलाफ केवल हवा-हवाई आरोप नहीं हैं, बल्कि एसीबी की प्राथमिक जांच (PE संख्या 21/2025) और विभागीय जांच समितियों ने उनकी मिलीभगत और भ्रष्टाचार को प्रमाणित माना है। एसीबी ने 18 मार्च 2026 को दर्ज अपनी एफआईआर में वर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत नामजद किया है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा उस सीएलपीसी (CLPC) कमेटी के सक्रिय सदस्य थे, जिसने नियमों को ताक पर रखकर फर्जी अनुभव वाली फर्म की 3.37 करोड़ रुपये की अमानत राशि (EMD) अवैध रूप से लौटाई और एक अन्य फर्म को करोड़ों का अतिरिक्त भुगतान कर सरकारी खजाने को भारी चपत लगाई।
भ्रष्टाचार की दोहरी मार: फर्जीवाड़ा और करोड़ों का अतिरिक्त भुगतान
के.पी. वर्मा की भूमिका ‘निदेशक तकनीकी’ के रूप में दोनों प्रमुख प्रकरणों में संदिग्ध रही है। पहले प्रकरण में एबी इन्टरप्राइजेज के फर्जी दस्तावेज पकड़े जाने के बावजूद वर्मा की मौजूदगी वाली कमेटी ने न तो फर्म को डिबार किया और न ही उसकी अमानत राशि जब्त की। वहीं दूसरे प्रकरण में आरसी पावर प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर की वित्तीय शर्तों में गुपचुप तरीके से बदलाव किए गए और अनुमानित लागत से कई गुना अधिक यानी 237 करोड़ रुपये का कार्यादेश (Work Order) जारी कर दिया गया। विभागीय पोर्टल्स और एसीबी की फाइलें चीख-चीख कर इस भ्रष्टाचार की गवाही दे रही हैं, फिर भी कार्रवाई का पहिया थमा हुआ है।
आखिर किसके संरक्षण में रुकी है कार्रवाई? मुख्यमंत्री से सीधा सवाल
सूत्रों की मानें तो वर्तमान सरकार में इतने बड़े भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद भी के.पी. वर्मा को उनकी ‘तगड़ी राजनीतिक एप्रोच’ के चलते ही अजमेर डिस्कॉम की कमान सौंपी गई है। सवाल यह उठता है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख का दावा करते हैं, तो के.पी. वर्मा जैसे दागी अधिकारी पर यह विशेष मेहरबानी क्यों? क्या विभाग के आला अधिकारी और सफेदपोश नेता वर्मा को बचाने के लिए जांच एजेंसियों पर दबाव बना रहे हैं? ‘द पब्लिक हब’ सीधा सवाल पूछता है कि क्या मुख्यमंत्री अपनी नीति का सम्मान करते हुए वर्मा को तत्काल पद से हटाकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेंगे या राजनीतिक रसूख के आगे कानून बौना बना रहेगा?
