स्मार्ट सिटी को बना दिया ‘बदरंग सिटी’!

स्मार्ट सिटी को बना दिया 'बदरंग सिटी'!

स्मार्ट सिटी को बना दिया ‘बदरंग सिटी’! हेरिटेज जयपुर में भूमिगत केबलिंग के नाम पर करोड़ों का खेल? जमीन के बजाय दीवारों पर दौड़ रहीं बिजली की लाइनें’, ‘त्रिपोलिया बाजार से बापू बाजार तक बदसूरत केबलों का जाल’

विशेष संवाददाता – द पब्लिक हब

जयपुर। गुलाबी नगरी को विश्वस्तरीय हेरिटेज सिटी बनाने का सपना दिखाकर शुरू की गई स्मार्ट सिटी परियोजना कहीं सरकारी धन की बर्बादी और भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला तो नहीं बन गई? शहर को सुंदर बनाने के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हुए, लेकिन नतीजा यह है कि जयपुर के ऐतिहासिक बाजारों की दीवारों, मेहराबों और रास्तों पर बिजली की केबलों का ऐसा जाल दिखाई दे रहा है, मानो स्मार्ट सिटी नहीं, ‘बदरंग सिटी’ विकसित की जा रही हो।

जयपुर स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत ऐतिहासिक बाजारों में ओवरहेड बिजली लाइनों को भूमिगत करने का काम कराया गया। इसके लिए स्वास्तिक इंफ्रा को जिम्मेदारी सौंपी गई। उद्देश्य था कि बिजली के तारों का जाल हटेगा, ऐतिहासिक इमारतों की खूबसूरती लौटेगी और आम नागरिकों को सुरक्षित विद्युत व्यवस्था मिलेगी। लेकिन मौके की तस्वीरें और सामने आए कार्यों से जुड़े सवाल इस पूरी परियोजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर संदेह खड़े कर रहे हैं।

परियोजना की मूल मंशा साफ थी। पुरानी ओवरहेड लाइनों को हटाकर निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार केबलों को भूमिगत करना था। बाजारों में तय मानकों के अनुसार व्यवस्थित तरीके से लगाए जाने थे, ताकि हेरिटेज बाजारों की मूल सुंदरता प्रभावित न हो। लेकिन मौके पर दिखाई दे रही स्थिति इन उद्देश्यों के विपरीत नजर आती है।

  • कई स्थानों पर केबलें खुले में और दीवारों के सहारे दिखाई दे रही हैं।
  • ऐतिहासिक भवनों और मेहराबों पर बिजली की लाइनें लटकती नजर आती हैं।
  •  पुरानी विद्युत लाइनों को पूरी तरह हटाए जाने पर सवाल हैं।
  •  पिलर बॉक्स की स्थापना और कार्य की गुणवत्ता की जांच जरूरी है। कई स्थलों पर भूमिगत वायरिंग का मामला नहीं है। खुले और असुरक्षित विद्युत संयोजन बारिश, नमी, टूट-फूट या तकनीकी खराबी की स्थिति में गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। ऐसे में सवाल है कि आम नागरिकों और बाजारों में आने वाले हजारों लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

त्रिपोलिया बाजार, हनुमान जी का रास्ता और बापू बाजार जैसे प्रमुख इलाकों में कई स्थानों पर केबल जमीन के नीचे होने के बजाय दीवारों, खंभों और ऐतिहासिक मेहराबों पर दिखाई दे रही हैं। सवाल यह है कि जब काम भूमिगत केबलिंग का था तो फिर जमीन के ऊपर तारों का यह जाल किस योजना और किस तकनीकी स्वीकृति के तहत छोड़ा गया?

काम अधूरा तो भुगतान पूरा कैसे, करोड़ों के हिसाब का हिसाब कौन देगा?

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू वित्तीय भुगतान है। यदि ठेके की शर्तों के अनुसार काम पूरा नहीं हुआ, यदि मौके पर भूमिगत केबलिंग की जगह खुली लाइनें मौजूद हैं और यदि गुणवत्ता मानकों की अनदेखी हुई है, तो संबंधित कार्यों का निरीक्षण किसने किया?

क्या काम का भौतिक सत्यापन किया गया था? क्या यह पूरा कार्य क्वालिटी ऑडिट हुआ? क्या माप पुस्तिका (Measurement Book-MB) में वास्तविक कार्य का सही विवरण दर्ज है? क्या भुगतान से पहले तकनीकी अधिकारियों ने मौके पर जाकर काम की पुष्टि की थी?

और सबसे बड़ा सवाल – यदि काम में कमियां थीं तो ठेकेदार को भुगतान किस आधार पर जारी किया गया?

इन सवालों के जवाब डिस्कॉम और परियोजना से जुड़े अधिकारियों को सार्वजनिक करने चाहिए। भुगतान की राशि, कार्यादेश, स्वीकृत अनुमान, वास्तविक कार्य और गुणवत्ता जांच की रिपोर्ट सामने आए बिना वित्तीय पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल खत्म नहीं होंगे।

जांच कमेटी या क्लीन चिट देने की कवायद?

आरोप हैं कि कार्यों की गुणवत्ता और अनियमितताओं को लेकर जांच की प्रक्रिया अपनाई गई, लेकिन निष्पक्ष और विस्तृत स्थल निरीक्षण के बजाय औपचारिकता निभाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह अपने आप में गंभीर प्रशासनिक सवाल है। जांच कमेटी ने किन स्थानों का निरीक्षण किया? क्या त्रिपोलिया बाजार, हनुमान जी का रास्ता और बापू बाजार में वास्तविक स्थिति का दस्तावेजीकरण किया गया? क्या फोटोग्राफिक साक्ष्यों का परीक्षण हुआ? क्या संबंधित ठेकेदार से जवाब मांगा गया? जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। जनता के पैसे से हुए इस काम की जांच जनता से छिपाई क्यों जाए?

सवालों के घेरे में ठेकेदार, फिर नए कार्यादेश कैसे?

स्वास्तिक इंफ्रा की भूमिका की अब जांच के दायरे में लाई जानी चाहिए। यदि कंपनी के काम में गंभीर तकनीकी खामियां पाई गई हैं तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित फर्म को आगे नए कार्यादेश किस आधार पर दिए गए। क्या पुराने कार्यों की गुणवत्ता परीक्षण पूरा हुआ था? क्या कमियों को दुरुस्त कराया गया? क्या अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई हुई? यदि गंभीर अनियमितताओं के बावजूद नए कार्यादेश जारी किए गए हैं तो यह अधिकारियों की निर्णय प्रक्रिया पर बड़ा सवाल है।

हेरिटेज की कीमत पर किसका विकास?

जयपुर की पहचान उसके ऐतिहासिक बाजार, गुलाबी इमारतें, स्थापत्य कला और पारंपरिक गलियां हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण शहर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में स्थान मिला है। ऐसे शहर में सरकारी परियोजनाओं के नाम पर यदि दीवारों और मेहराबों पर केबलों का जाल बिछता है, तो यह केवल निर्माण कार्य की खामी नहीं, बल्कि विरासत संरक्षण की सोच पर भी सवाल है। स्मार्ट सिटी का अर्थ केवल बजट खर्च करना, ठेके जारी करना और भुगतान करना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है सुरक्षित, सुव्यवस्थित और नागरिकों के लिए बेहतर शहर बनाना।

 

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