संस्कृत विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों के स्टाफ अनुमोदन आदेश किए निरस्त

संस्कृत विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों के स्टाफ अनुमोदन आदेश किए निरस्त

मिशन विश्वविद्यालय: द पब्लिक हब की खबर का असर

कनिष्ठ अधिकारी के स्तर पर वरिष्ठ विषय विशेषज्ञों की पात्रता जांचने का अधिकार किसने दिया ? समीक्षा बैठक के बाद विश्वविद्यालय का बड़ा फैसला’

विशेष संवाददाता – द पब्लिक हब

जयपुर। राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में शैक्षणिक स्टाफ अनुमोदन की प्रक्रिया पर द पब्लिक हब की ओर से उठाए गए सवालों के बाद बड़ा प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय ने अपने से संबद्ध महाविद्यालयों के शैक्षणिक स्टाफ अनुमोदन आदेशों और उनसे जुड़ी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया है। विश्वविद्यालय के आदेश के मुताबिक, तत्कालीन सहायक कुलसचिव (शैक्षणिक) ने अपने स्तर पर हस्ताक्षर कर जो अनुमोदन पत्र जारी किए थे, उनकी समीक्षा में गंभीर प्रक्रियागत अनियमितताएं सामने आईं। विश्वविद्यालय ने माना कि ये आदेश विश्वविद्यालय परिनियमों और GC विनियम, 2018 के निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप नहीं थे।

जिस मुद्दे पर द पब्लिक हब ने उठाए सवाल, उसी प्रक्रिया पर विश्वविद्यालय की समीक्षा

द पब्लिक हब ने अपनी पिछली खबर में सवाल उठाया था कि जिस विषय का कोई अधिकारी विशेषज्ञ नहीं है, उस विषय के वरिष्ठ शिक्षकों और विशेषज्ञों की शैक्षणिक पात्रता जांचने का अधिकार उसे किस नियम के तहत मिला? क्या सहायक कुलसचिव स्तर के अधिकारी को स्टाफ चयन और अनुमोदन का अधिकार था? अंतिम स्वीकृति देने और हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी किसकी थी?

अब विश्वविद्यालय के आधिकारिक आदेश में संबंधित अनुमोदन प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप नहीं पाए जाने का उल्लेख है। इस घटनाक्रम ने खबर में उठाए गए अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक जवाबदेही के को फिर केंद्र में ला दिया है।

समीक्षा के बाद संबद्ध महाविद्यालयों के ऐसे अनुमोदन आदेशों और संबंधित कार्यवाहियों को निरस्त करने का निर्णय लिया गया।

आदेश निरस्त, लेकिन जवाबदेही का सवाल बरकरार

विश्वविद्यालय की कार्रवाई के बाद अब कई सवालों के जवाब बाकी हैं। नियमों के विपरीत अनुमोदन जारी होने से पहले प्रशासनिक जांच क्यों नहीं हुई? इन आदेशों के आधार पर चयनित शिक्षकों की स्थिति क्या होगी? संबंधित महाविद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? और सबसे अहम, इस पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी? विश्वविद्यालय के आदेश में अनुमोदन पत्रों और संबंधित कार्यवाहियों को निरस्त करने की बात है, लेकिन शिक्षकों की व्यक्तिगत नियुक्तियों पर अंतिम निर्णय अथवा आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं की गई है। द पब्लिक हब की खबर का असर अब आधिकारिक कार्रवाई के रूप में सामने है। खबर में उठाए गए अधिकारों की सीमा, विषय विशेषज्ञता और अनुमोदन प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़े सवालों के बीच विश्वविद्यालय ने संबद्ध महाविद्यालयों के स्टाफ अनुमोदन आदेश निरस्त कर दिए हैं।

अब असली परीक्षा विश्वविद्यालय प्रशासन की है कि कार्रवाई केवल आदेश निरस्त करने तक सीमित रहेगी या इस पूरी प्रक्रिया में हुई चूक की जवाबदेही भी तय होगी?

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