प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव कराने की समय सीमा को लेकर चल रही कानूनी जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है। राज्य सरकार द्वारा चुनाव टालने के लिए दायर प्रार्थना पत्र पर राजस्थान हाईकोर्ट 11 मई को सुनवाई करेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान परिस्थितियों में दिसंबर 2026 से पहले चुनाव कराना तकनीकी और प्रशासनिक रूप से संभव नहीं है।
सरकार के तर्क: संसाधनों की कमी और ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने पूर्व के आदेश (15 अप्रैल तक चुनाव कराने) की पालना के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन कई बाधाएं सामने आईं:
- संसाधनों की अनुपलब्धता: स्कूलों की परीक्षाएं, स्टाफ की कमी और ईवीएम मशीनों की उपलब्धता न होने का हवाला दिया गया है।
- ओबीसी आरक्षण: ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सीटों का निर्धारण अभी प्रक्रियाधीन है।
- कार्यकाल का तालमेल: सरकार का तर्क है कि अक्टूबर-दिसंबर में कई अन्य निकायों का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। ऐसे में एक साथ चुनाव कराने से ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की धारणा को बल मिलेगा।
राज्य चुनाव आयोग का स्टैंड: सरकार के सुर में सुर
हैरानी की बात यह है कि स्वतंत्र निकाय होने के बावजूद राज्य चुनाव आयोग ने भी चुनाव टालने की पैरवी की है। आयोग ने हाईकोर्ट में अर्जी लगाकर सरकारी तर्कों का समर्थन किया और कहा कि ओबीसी रिजर्वेशन के फाइनल निर्धारण के बिना चुनाव प्रक्रिया शुरू करना व्यावहारिक नहीं है।
अवमानना याचिका का डर: 18 मई को दूसरी सुनवाई
एक तरफ सरकार समय मांग रही है, वहीं दूसरी तरफ पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिरिराज सिंह देवंदा ने कोर्ट के आदेश की अवहेलना का मुद्दा उठाया है। उनकी अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट 18 मई को सुनवाई करेगा, जिसमें राज्य चुनाव आयोग पर समय पर चुनाव न कराने का आरोप लगाया गया है।
निष्कर्ष: यदि हाईकोर्ट 11 मई की सुनवाई में सरकार के तर्कों से सहमत होता है, तो प्रदेश में चुनावी बिगुल अब साल के अंत में ही बजेगा। हालांकि, अवमानना याचिका का दबाव आयोग और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
