राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर अनिश्चितता के बादल और गहरे हो गए हैं। जहाँ लाखों मतदाता और संभावित प्रत्याशी चुनाव तारीखों के ऐलान का इंतजार कर रहे हैं, वहीं राज्य सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के बीच खींचतान ने पूरी प्रक्रिया को ठप कर दिया है। अदालतों द्वारा निर्धारित 15 अप्रैल 2026 की समय-सीमा सिर पर है, लेकिन धरातल पर चुनाव की तैयारियाँ ‘जीरो’ नजर आ रही हैं।
OBC आयोग का कार्यकाल: कल आखिरी दिन
सबसे बड़ा पेंच पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की रिपोर्ट को लेकर फंसा है। आयोग का कार्यकाल कल (31 मार्च) समाप्त हो रहा है। आयोग ने फरवरी में ही 400 ग्राम पंचायतों के अधूरे आंकड़ों को लेकर सरकार को पत्र लिखा था, लेकिन डेटा अब तक नहीं मिला है। यदि कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया, तो आरक्षण का निर्धारण और चुनाव की प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए लटक सकती है।
बजट का गणित: बिना जनप्रतिनिधि खर्च हो रहे ₹16,000 करोड़
चुनाव में देरी का सबसे बड़ा ‘साइड इफेक्ट’ विकास कार्यों पर पड़ रहा है। प्रदेश की पंचायतों और निकायों की कमान वर्तमान में प्रशासकों (अफसरों) के हाथ में है।
| निकाय/पंचायत | कुल वार्षिक बजट | विकास कार्यों पर खर्च (लगभग) | वर्तमान स्थिति |
| शहरी निकाय | ₹6,000 करोड़ | ₹2,500 करोड़ | प्रशासकों का राज |
| पंचायतें | ₹10,000 करोड़ | ₹5,000+ करोड़ | नौकरशाही की मनमानी |
विपक्ष का आरोप है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की गैर-मौजूदगी में अधिकारी मनमाने ढंग से बजट ठिकाने लगा रहे हैं।
कानूनी पेचीदगियां और ‘सुप्रीम’ आदेश
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन और 15 अप्रैल 2026 तक हर हाल में चुनाव कराए जाएं। अब पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की अवमानना याचिका पर 2 अप्रैल को सुनवाई होनी है, जिसमें सरकार और निर्वाचन आयोग को जवाब देना होगा।
सियासी बयानबाजी: हार का डर बनाम रिपोर्ट का इंतजार
“प्रदेश में सरकार की स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए हार के डर से चुनाव टाले जा रहे हैं। जनप्रतिनिधियों की भूमिका खत्म कर पंचायतों को अफसरों को सौंप दिया गया है।”
— टीकाराम जूली, नेता प्रतिपक्ष
“सरकार की ओर से कोई बाधा नहीं है। हम सिर्फ पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। जिस दिन निर्वाचन विभाग तारीख तय करेगा, हम चुनाव करा देंगे।”
— झाबर सिंह खर्रा, स्वायत्त शासन मंत्री
निष्कर्ष (The Reality Check):
संविधान के अनुसार 5 साल में चुनाव कराना बाध्यकारी है, लेकिन राजस्थान में ‘सिस्टम’ फिलहाल सुस्ती के मूड में है। यदि अगले 48 घंटों में OBC आयोग के कार्यकाल या डेटा पर फैसला नहीं हुआ, तो 15 अप्रैल की डेडलाइन टूटना लगभग तय है।
