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Home - जीवन शैली - मेघालय का वांगला नृत्य: जब ‘100 ढोलों’ की गूंज और भैंस के सींग की बांसुरी पर थिरक उठता है पूरा गारो समुदाय

जीवन शैली

मेघालय का वांगला नृत्य: जब ‘100 ढोलों’ की गूंज और भैंस के सींग की बांसुरी पर थिरक उठता है पूरा गारो समुदाय

By The Public Hub
Last updated: May 21, 2026
5 Min Read

भारत का पूर्वोत्तर राज्य मेघालय, जिसे ‘बादलों का घर’ भी कहा जाता है, अपनी अनूठी संस्कृति, प्राकृतिक खूबसूरती और जीवंत लोक कलाओं के लिए पूरी दुनिया में एक अलग पहचान रखता है। यहां की गारो (Garo) जनजाति का एक ऐसा पारंपरिक उत्सव इन दिनों अपनी पूरी रंगत में है, जिसे देखकर हर कोई उत्सुकता और ऊर्जा से भर जाता है। इस उत्सव का सबसे मुख्य और जादुई आकर्षण है— वांगला नृत्य (Wangla Dance)

Contents
धार्मिक आस्था और धरती मां का आभार: क्या है इस नृत्य का महत्व?संगीत का जादू और प्रकृति के रंगों से सजी पारंपरिक वेशभूषानई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने वाला ‘सांस्कृतिक धागा’

अपनी अद्भुत अनूठेपन के कारण इसे ‘100 ढोलों का नृत्य’ (The Dance of 100 Drums) भी कहा जाता है। जब इन 100 ढोलों की थाप एक साथ हवा में गूंजती है, तो पूरा गारो समुदाय बिना किसी भेदभाव के एक सुर में झूम उठता है।

धार्मिक आस्था और धरती मां का आभार: क्या है इस नृत्य का महत्व?

वांगला नृत्य गारो समुदाय के लिए केवल मनोरंजन या उत्सव का साधन नहीं है, बल्कि इसका संबंध उनकी गहरी धार्मिक आस्था और जीवन दर्शन से है। यह नृत्य मुख्य रूप से सर्दियों की दस्तक के साथ, फसल की कटाई के बाद आयोजित होने वाले ‘वांगला उत्सव’ के दौरान किया जाता है।

गारो समाज के लोग इस खास अवसर पर अपने मुख्य सूर्य देवता ‘सलजोंग’ (Sun God Saljong) की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। गारो मान्यताओं में सूर्य देवता सलजोंग को अच्छी फसल, खेतों में हरियाली और जीवन में समृद्धि का मुख्य प्रतीक माना जाता है। महीने भर की कड़ी मेहनत के बाद जब अनाज घर आता है, तो भगवान को धन्यवाद देने और प्रकृति के प्रति अपना आभार प्रकट करने के लिए ही इस महा-नृत्य का आयोजन किया जाता है।

संगीत का जादू और प्रकृति के रंगों से सजी पारंपरिक वेशभूषा

इस नृत्य की सबसे बड़ी और सम्मोहित कर देने वाली खासियत इसका पारंपरिक संगीत और कलाकारों का रूप-रंग है।

  • ‘दामा’ ढोल और सींग की बांसुरी: वांगला नृत्य में ढोल की थाप सबसे मुख्य भूमिका निभाती है। उत्सव के दौरान ‘दामा’ कहे जाने वाले विशेष रूप से निर्मित लंबे और भारी ढोल बजाए जाते हैं। इन 100 ढोलों की गूंज को और अधिक कर्णप्रिय व मधुर बनाने के लिए संगीतकार भैंस के सींग से बनी खास बांसुरी (Adil) बजाते हैं, जिससे जंगलों और पहाड़ियों में एक अनोखी धुन तैरने लगती है।
  • प्राकृतिक रंगों से सजी पोशाक: संगीत के साथ-साथ इस नृत्य की वेशभूषा भी दर्शकों की आंखें चौंधिया देती है। नृत्य के दौरान पुरुष और महिला कलाकार पूरी तरह से पारंपरिक लिबास और बेहतरीन आभूषणों से सजे होते हैं:
    • पुरुष कलाकारों की पोशाक: पुरुष अपने सिर पर पक्षियों के पंखों से सजे बेहद आकर्षक और रंगीन मुकुट (Do’kru) पहनते हैं और पारंपरिक लुंगी व गमछा धारण करते हैं।
    • महिला कलाकारों की पोशाक: महिलाएं सुंदर हाथ से बुने रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े (Dakmanda) और मोतियों व सिक्कों से बने भारी आभूषण पहनती हैं।
    • खासियत: इन सभी पोशाकों की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन्हें तैयार करने में केवल प्राकृतिक रंगों (Natural Dyes) का इस्तेमाल किया जाता है, जो स्थानीय गारो कला की शुद्धता को पेश करते हैं।

नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने वाला ‘सांस्कृतिक धागा’

आधुनिकता के इस दौर में जहां कई लोक कलाएं लुप्त होने की कगार पर हैं, वहीं वांगला उत्सव गारो समाज के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखने का सबसे बड़ा जरिया है। यह आयोजन पूरे समाज में एकता, भाईचारे और सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है।

बुजुर्गों का मानना है कि इस तरह के सामूहिक नृत्यों के जरिए वे अपनी नई पीढ़ी (Gen-Z) को उनके गौरवशाली इतिहास, लोक कथाओं और जड़ों से जोड़कर रखते हैं। यही वजह है कि आज भी जब मेघालय की वादियों में वांगला की थाप पड़ती है, तो उसमें सिर्फ पैर नहीं थिरकते, बल्कि भारत की प्राचीन जनजातीय संस्कृति का दिल धड़कता है।

TAGGED:100 Drums Dance IndiaGaro Tribe Folk DanceIndigenous Harvest Festivals.Meghalaya Wangla FestivalNortheast India Cultural HeritageShillong Tourism NewsSun God Saljong WorshipTraditional Garo Tribe Dress
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