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‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ की अनदेखी पर सरकार को नोटिस; जोधपुर के जल संकट को सुलझाने के लिए बनेगी उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति

By The Public Hub
Last updated: May 22, 2026
6 Min Read

जोधपुर। सूर्यनगरी जोधपुर में गहराते जल संकट, सूखते बांधों और प्राचीन जल स्रोतों की बदहाली पर राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मानवीय संकट पर ऐतिहासिक स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज किया है।

Contents
अखबारों की सुर्खियों ने खींचा कोर्ट का ध्यान, हालात भयावहपानी मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े फैसलों की नजीररेन वॉटर हार्वेस्टिंग में लापरवाही, बनेगी विशेषज्ञ समितिकोर्ट के कड़े अंतरिम निर्देश: हलफनामे में देना होगा जवाब

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि, “संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है और स्वच्छ पेयजल के बिना यह पूरी तरह असंभव है।” मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने मुख्य सचिव, पीएचईडी, जेडीए, नगर निगम और उत्तर-पश्चिम रेलवे सहित 14 विभागों के आला अधिकारियों को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। इस अहम मामले की सुनवाई आज (22 मई) को होगी।

अखबारों की सुर्खियों ने खींचा कोर्ट का ध्यान, हालात भयावह

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने स्थानीय अखबारों में प्रकाशित 17 प्रमुख खबरों का विशेष रूप से संज्ञान लिया। कोर्ट ने प्रमुख अख़बार ‘दैनिक भास्कर’ में छपी ख़बरों— ‘बाई रे! 14 करोड़ डूब गए…’, ‘जोधपुर में जल इमरजेंसी… बस 2 दिन का पानी बचा’, ‘पानी की बूंद-बूंद जरूरी, पर माफिया चुराकर बेच रहा’ और ‘टैंकर लूट के बाद दिस दिन में 10 प्रदर्शन और मारपीट भी’ का हवाला देते हुए शहर की वर्तमान स्थिति को बेहद भयावह करार दिया।

आंकड़ों में शहर का संकट: कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि 210 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) पानी की जरूरत वाले इस शहर के 43 में से 19 बांध पूरी तरह सूख चुके हैं। पूरी आबादी 300 ट्यूबवेल और 80 टैंकरों के आपातकालीन सहारे पर निर्भर है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह संकट केवल नहर बंदी का अस्थायी असर नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक जलाशयों की उपेक्षा, भूजल के अंधाधुंध दोहन और अव्यवस्थित शहरी विस्तार का नतीजा है।

पानी मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े फैसलों की नजीर

हाईकोर्ट ने अपने 25 पेज के विस्तृत आदेश में लीगल फ्रेमवर्क को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चार ऐतिहासिक मुकदमों का हवाला दिया। कोर्ट ने ‘सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य’, ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, ‘एपी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड बनाम प्रो. एम.वी. नायडू’ और ‘हिंच लाल तिवारी मामला’ को नजीर के तौर पर पेश किया।

खंडपीठ ने कहा कि प्रदूषण मुक्त पानी का अधिकार ‘जीवन के अधिकार’ का हिस्सा है। इसके साथ ही कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 47 (सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार), अनुच्छेद 48A (पर्यावरण व झीलों की रक्षा) और अनुच्छेद 51A(g) के तहत नागरिकों और राज्य के मौलिक कर्तव्यों की भी विस्तृत व्याख्या की।

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग में लापरवाही, बनेगी विशेषज्ञ समिति

खंडपीठ ने सिस्टम की ढांचागत विफलताओं पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009’ की धारा 238(1), भवन उप-विधियों और ‘शहरी जल आपूर्ति नीति 2018’ के तहत रेन वॉटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य है। इसके बावजूद नई इमारतों को प्रमाण-पत्र देते समय इसकी मॉनिटरिंग में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।

इसके स्थाई समाधान के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार को एक ‘उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति’ बनाने का आदेश दिया है। इस समिति में केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं होंगे, बल्कि हाइड्रोलॉजिस्ट, भूजल विशेषज्ञ, पर्यावरण वैज्ञानिक, वेटलैंड व इकोलॉजी एक्सपर्ट, टाउन प्लानर्स और केंद्रीय भूजल बोर्ड के प्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल किए जाएंगे।

कोर्ट के कड़े अंतरिम निर्देश: हलफनामे में देना होगा जवाब

कोर्ट ने प्रशासन को कई कड़े निर्देश जारी करते हुए बिंदुवार हलफनामा मांगा है:

  • जीपीएस और फोटो: चांद बावड़ी, तापी बावड़ी, गुलाब सागर, गांगलाव तालाब और तूरजी का झालरा जैसे ऐतिहासिक स्रोतों की वर्तमान स्थिति, अतिक्रमण और दुर्दशा को साबित करने के लिए प्रशासन को उनकी जीपीएस लोकेशन और ताजा तस्वीरें कोर्ट में पेश करनी होंगी।
  • सीवरेज पर तुरंत रोक: पारंपरिक जल चैनलों और नहरों (जैसे गुलाबसागर-फतेहसागर) में सीवरेज का गंदा पानी और कचरा गिरने पर तत्काल रोक लगाई जाए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पानी की गुणवत्ता की जांच करे।
  • वाटर ट्रेन की फिजिबिलिटी: आपातकालीन पेयजल आपूर्ति के लिए रेलवे की वॉटर ट्रेनों के माध्यम से पानी लाने की व्यवहार्यता (फिजिबिलिटी रिपोर्ट) पेश की जाए।
  • मास्टर प्लान: पारंपरिक जल धरोहरों के जीर्णोद्धार, गाद निकालने (डीसिल्टेशन), अतिक्रमण हटाने और नए हार्वेस्टिंग सिस्टम के लिए एक सटीक टाइमलाइन और एक्शन प्लान को ‘मास्टर वाटर सिक्योरिटी प्लान’ में शामिल किया जाए।
  • माफिया पर सख्ती: पानी की कालाबाजारी और बिना अनुमति चल रहे टैंकर माफिया पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।

इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में कोर्ट की सहायता के लिए अधिवक्ता अभिषेक मेहता और अदिति मोड को ‘न्याय मित्र’ (Amicus Curiae) नियुक्त किया गया है। शहरवासियों और प्रशासन की निगाहें आज (22 मई) होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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