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ट्रायल में बड़ी राहत: अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज़ों को दोबारा साबित करने की जरूरत नहीं—सुप्रीम कोर्ट

By The Public Hub
Last updated: May 15, 2026
3 Min Read

देश की सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक व्यवस्था दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई दस्तावेज़ पहले से ही पुलिस चार्जशीट या अभियोजन पक्ष के रिकॉर्ड का हिस्सा है, तो आरोपी व्यक्ति उसे बिना किसी औपचारिक गवाही या हस्ताक्षर साबित किए ‘प्रदर्श’ (Exhibit) के रूप में पेश कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 294 का मूल उद्देश्य अनावश्यक तकनीकी बाधाओं को हटाकर ट्रायल में लगने वाले समय को बचाना है।

Contents
क्या था मामला? (R. Ganesh vs State of Tamil Nadu)हाईकोर्ट की चूक और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याप्रामाणिकता और राज्य का अधिकार

क्या था मामला? (R. Ganesh vs State of Tamil Nadu)

यह फैसला जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने ‘आर. गणेश बनाम तमिलनाडु राज्य’ मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। मामले में आरोपी ने बैंक रिकॉर्ड, आयकर रिटर्न (ITR), खाता खोलने के फॉर्म और रिस्क रेटिंग जैसे दस्तावेज़ों को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार करने की मांग की थी। आरोपी का तर्क था कि चूंकि ये दस्तावेज़ अभियोजन पक्ष द्वारा पहले ही रिकॉर्ड पर लाए जा चुके हैं, इसलिए इन्हें दोबारा साबित करने की औपचारिकता केवल समय की बर्बादी है।

हाईकोर्ट की चूक और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या

इससे पहले, निचली अदालत और मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी की इस मांग को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने ‘पंजाब राज्य बनाम नायब दीन (2001)’ के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि दस्तावेज़ों को औपचारिक रूप से साबित करना अनिवार्य है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी समझ को सुधारते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने धारा 294 और धारा 296 के बीच के अंतर को समझने में गलती की है।

  • धारा 294: दस्तावेज़ों की स्वीकार्यता और उनकी प्रामाणिकता से संबंधित है।
  • धारा 296: उन गवाहों से जुड़ी है जिनकी गवाही हलफनामे के माध्यम से दी जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि ‘नायब दीन’ मामला धारा 296 पर आधारित था, जो इस विशेष विवाद पर लागू नहीं होता।

प्रामाणिकता और राज्य का अधिकार

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यदि दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता पर कोई वास्तविक विवाद नहीं है, तो उन्हें साक्ष्य के रूप में पढ़ने में कोई तकनीकी अड़चन नहीं होनी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के पास अभी भी इन दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होगा।

“कानून का उद्देश्य न्याय को सुगम बनाना है, न कि उसे जटिल तकनीकी औपचारिकताओं में उलझाना। यदि दस्तावेज़ सरकारी रिकॉर्ड या चार्जशीट का हिस्सा हैं, तो उन्हें आरोपी के पक्ष में साक्ष्य के रूप में पढ़ने की अनुमति दी जानी चाहिए।” — सुप्रीम कोर्ट

यह फैसला भविष्य में उन हजारों आपराधिक मामलों के निपटारे में तेजी लाएगा जहां केवल दस्तावेज़ों को ‘साबित’ करने के चक्कर में वर्षों तक सुनवाई लटकी रहती है।

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