नई दिल्ली, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और चयन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज ‘निजी जानकारी’ की श्रेणी में नहीं आते हैं।
गोपनीयता की आड़ में तथ्यों को छिपाना गलत माननीय न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल ने ‘जयश्री दुबे बनाम केंद्रीय सूचना आयोग’ मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकारी पदों पर चयन प्रक्रिया निष्पक्ष थी या नहीं। कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) और धारा 11 (थर्ड पार्टी की सहमति) का गलत हवाला देकर जनहित की सूचनाओं को रोका नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु:
- सार्वजनिक सूचना: यदि कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी में नियुक्त हुआ है, तो उसकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव प्रमाण पत्र और नियुक्ति आदेश सार्वजनिक सूचना माने जाएंगे।
- थर्ड पार्टी की सहमति अनिवार्य नहीं: यदि सूचना जनहित में है और उससे किसी तीसरे व्यक्ति को वास्तविक नुकसान नहीं हो रहा है, तो उसकी सहमति के बिना भी जानकारी देनी होगी।
- अधिकारी पर जुर्माना: आरटीआई को जानबूझकर खारिज करने और पारदर्शिता से समझौता करने के कारण संबंधित जन सूचना अधिकारी पर कोर्ट ने 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
15 दिनों में देनी होगी सूचना अदालत ने आदेश दिया है कि आवेदनकर्ता को मांगी गई सभी सूचनाएं 15 दिनों के भीतर नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएं। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पारदर्शिता सर्वोपरि है और किसी अयोग्य व्यक्ति को बचाने के लिए आरटीआई को खारिज करना कानूनन गलत है।
