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Home - जयपुर - नाट्यशास्त्र का कड़वा सच: अवसाद और तनाव मिटाने वाले ‘पंचम वेद’ को समाज ने माना महज एक साइड एक्टिविटी!

जयपुर

नाट्यशास्त्र का कड़वा सच: अवसाद और तनाव मिटाने वाले ‘पंचम वेद’ को समाज ने माना महज एक साइड एक्टिविटी!

By The Public Hub
Last updated: June 8, 2026
8 Min Read

जयपुर। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के निदेशक और जाने-माने रंगकर्मी चितरंजन त्रिपाठी ने राजस्थान में एनएसडी का क्षेत्रीय केंद्र (Regional Center) स्थापित किए जाने की मांग का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि एक थिएटर कलाकार होने के नाते वह स्वयं चाहते हैं कि देश के हर राज्य में एनएसडी का एक केंद्र हो, ताकि स्थानीय कलाकारों को दिल्ली की दौड़ न लगानी पड़े और उन्हें अपने ही प्रदेश में उच्चस्तरीय रंगमंच प्रशिक्षण उपलब्ध हो सके। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए केवल इच्छा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वित्तीय संसाधन, बुनियादी ढांचा और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच गहरा प्रशासनिक समन्वय भी बेहद जरूरी है।

Contents
सरकारों के स्तर पर बननी होगी सहमति, व्यावहारिक दृष्टिकोण जरूरी‘चिंटू और पिंटू’ की थ्योरी: कला के प्रति सामाजिक विडंबना पर तीखा व्यंग्यथिएटर कोई टाइमपास नहीं, यह तनाव दूर कर जीवन को गहराई देता हैहर स्कूल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय बने ‘थिएटर’अंग्रेजों की शिक्षा नीति ने बिगाड़ा खेल; अब मुख्यधारा में लौट रहा रंगमंच

त्रिपाठी जयपुर में आयोजित बच्चों की विशेष थिएटर वर्कशॉप ‘कोलाज ऑफ किलकारी’ के समापन समारोह के दौरान मीडिया से विशेष बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोकनाट्य परंपराएं और रंगकर्म की जीवंत सक्रियता इसे एक राष्ट्रीय स्तर के केंद्र के लिए पूरी तरह उपयुक्त बनाती हैं।

सरकारों के स्तर पर बननी होगी सहमति, व्यावहारिक दृष्टिकोण जरूरी

एनएसडी निदेशक ने केंद्र स्थापना की प्रक्रिया पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि वह मंच पर बैठकर कोई ऐसा हवाई वादा नहीं करना चाहते जो व्यावहारिक रूप से केवल उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा, “अगर मैं आज यह कह दूं कि कल से राजस्थान में एनएसडी का सेंटर शुरू हो जाएगा, तो वह सही बात नहीं होगी। यह एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया है। जब एनएसडी का गठन हुआ था, तब इसकी मूल अवधारणा में यह भावना शामिल थी कि रंगमंच की शिक्षा देश के कोने-कोने तक पहुंचे। लेकिन किसी भी नए केंद्र की स्थापना के लिए भवन, भूमि, बजट, तकनीकी सुविधाएं और प्रशिक्षित मानव संसाधन की जरूरत होती है, जो केंद्र और राज्य सरकार के आपसी सहयोग से ही संभव है।”

‘चिंटू और पिंटू’ की थ्योरी: कला के प्रति सामाजिक विडंबना पर तीखा व्यंग्य

चितरंजन त्रिपाठी ने आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और समाज में कला व संगीत के प्रति बने नजरिए पर बेहद रोचक और व्यंग्यात्मक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने ‘चिंटू और पिंटू’ की एक काल्पनिक थ्योरी के जरिए समाज के दोहरे चरित्र को बेनकाब किया:

  • अकादमिक विषयों का दबाव: उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हर स्कूल में दो तरह के छात्र होते हैं। एक ‘पिंटू’, जो गणित में 98 प्रतिशत अंक लाता है और दूसरा ‘चिंटू’, जिसके 85 प्रतिशत अंक हैं, लेकिन वह एक बेहतरीन गायक, तबला वादक या अभिनेता है। आमतौर पर स्कूल और शिक्षक पिंटू को ही अपना ‘ब्लू-आइड बॉय’ (चहेता) मानते हैं, क्योंकि समाज यह मान बैठा है कि रट्टा मारकर अच्छे अंक लाने वाला ही आगे बढ़ेगा।
  • अतिथियों के आने पर याद आता है ‘चिंटू’: त्रिपाठी ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जैसे ही स्कूल में किसी मंत्री, सांसद, जिला कलेक्टर या गणमान्य व्यक्ति का आगमन होने वाला होता है, अचानक स्कूल प्रशासन को चिंटू की याद आ जाती है। स्वागत समारोह के लिए गीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मंच पर प्रस्तुति के लिए वही छात्र अचानक महत्वपूर्ण हो जाता है जिसे पूरे साल दरकिनार किया गया था।
  • अगले ही दिन फिर वही बेरुखी: कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि बच्चों की तारीफ करते हैं, तालियां बजती हैं और चिंटू को लगता है कि उसकी कला की कद्र हो रही है। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि अगले ही दिन चिंटू फिर उसी पुरानी स्थिति में पहुंच जाता है, जहां उसे केवल ‘एक्स्ट्रा एक्टिविटी’ करने वाला एक सामान्य छात्र मान लिया जाता है। कला का उपयोग तो सब करते हैं, लेकिन उसे व्यक्तित्व विकास का मुख्य हिस्सा स्वीकार नहीं किया जाता।

थिएटर कोई टाइमपास नहीं, यह तनाव दूर कर जीवन को गहराई देता है

निदेशक ने कहा कि भारतीय रंगमंच की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है और भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी यह स्पष्ट लिखा गया है कि नाटक मनुष्य के दुख, अवसाद और मानसिक तनाव को दूर करने का सबसे सशक्त माध्यम है। रंगमंच बच्चों को विभिन्न किरदारों को जीने का अवसर देता है। जब कोई बच्चा मंच पर एक पुलिस अधिकारी, किसान या मजदूर की भूमिका निभाता है, तो वह दुनिया को एक नए दृष्टिकोण से देखना सीखता है। यही विधिक प्रक्रिया उसे समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और समझदार इंसान बनाती है।

हर स्कूल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय बने ‘थिएटर’

त्रिपाठी ने पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि आज के दौर में स्कूलों में थिएटर को केवल एक अतिरिक्त गतिविधि (Extra-Curricular Activity) के रूप में देखा जाता है, जो कि गलत है। उन्होंने कहा, “मैं जहां भी जाता हूं, शिक्षण संस्थानों से यही आग्रह करता हूं कि थिएटर को एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। रंगमंच बच्चों के भीतर अद्भुत आत्मविश्वास पैदा करता है। यह केवल अभिनय नहीं सिखाता, बल्कि जीवन जीने का सलीका सिखाता है। बच्चा आगे चलकर डॉक्टर बने, इंजीनियर बने या राजनेता, थिएटर से उसका जुड़ाव उसे एक बेहतर और संवेदनशील इंसान बनाएगा।”

अंग्रेजों की शिक्षा नीति ने बिगाड़ा खेल; अब मुख्यधारा में लौट रहा रंगमंच

इतिहास का हवाला देते हुए त्रिपाठी ने बताया कि प्राचीन भारतीय परंपरा में कला और नाट्यशास्त्र को ‘पंचम वेद’ का दर्जा प्राप्त था। पुराने समय में मंदिरों में विशेष रूप से ‘नात्य मंडप’ बनाए जाते थे, ताकि लोग दिनभर के श्रम और थकान के बाद नाटक देखकर मानसिक ऊर्जा प्राप्त कर सकें। थिएटर कभी हमारे जीवन की मुख्यधारा में था, लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद उनकी लॉर्ड मैकाले वाली शिक्षा नीति ने इसे धीरे-धीरे ‘एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी’ के हाशिए पर धकेल दिया। अब समय आ गया है कि इसे फिर से मुख्यधारा में लाया जाए।

उन्होंने गर्व व्यक्त करते हुए बताया कि जहां पहले केवल कुछ ही कार्यशालाएं आयोजित होती थीं, वहीं इस वर्ष एनएसडी द्वारा ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के भीतर देशभर में एक साथ 92 थिएटर वर्कशॉप्स आयोजित की जा रही हैं। आज एनएसडी केवल मुख्यधारा के कलाकारों के साथ ही नहीं, बल्कि समाज के वंचित वर्गों जैसे— ट्रांसजेंडर समुदाय, वरिष्ठ नागरिकों, जेल के बंदियों, झुग्गी-बस्ती के बच्चों और रिमांड होम के किशोरों तक पहुंचकर रंगमंच के जरिए उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

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