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जयपुरकानून व्यवस्था विभाग

क्या है ‘प्रतिकूल कब्जा’ (Adverse Possession)? मकान मालिक अपनी संपत्ति सुरक्षित रखने के लिए अपनाएं ये कानूनी तरीके

By The Public Hub
Last updated: April 4, 2026
4 Min Read

अक्सर बड़े शहरों में मकान मालिक अपना घर किराए पर देते समय एक अनजाने डर में रहते हैं— ‘क्या किराएदार लंबे समय तक रहने के बाद घर पर अपना अधिकार जमा सकता है?’ समाज में यह धारणा व्यापक है कि यदि कोई 12 साल तक रह जाए, तो वह संपत्ति का स्वामी बन जाता है। भारतीय कानून और संपत्ति नियमों के आधार पर जानते हैं कि इस ’12 साल के नियम’ की असलियत क्या है और आप अपनी प्रॉपर्टी को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।

Contents
क्या है ‘प्रतिकूल कब्जा’ (Adverse Possession) और 12 साल का नियम?क्या किराएदार भी कर सकता है दावा?मकान मालिकों के लिए सुरक्षा टिप्स: इन बातों का रखें ध्यानकिराएदारों के भी हैं अपने अधिकार

क्या है ‘प्रतिकूल कब्जा’ (Adverse Possession) और 12 साल का नियम?

भारतीय संपत्ति कानून में 12 साल का नियम परिसिमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 65 पर आधारित है। कानूनी भाषा में इसे ‘प्रतिकूल कब्जा’ कहा जाता है।

इसका सरल अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति किसी निजी संपत्ति पर:

  • बिना स्वामी की अनुमति के,
  • बिना किसी किराया अनुबंध (Rent Agreement) के,
  • लगातार, खुले और शत्रुतापूर्ण रूप से 12 वर्षों तक कब्जा बनाए रखे,
  • और इस अवधि में संपत्ति का असली मालिक कोई कानूनी कार्रवाई न करे,

तो वह व्यक्ति अदालत में उस संपत्ति पर अपना हक जताने का दावा कर सकता है। सरकारी संपत्ति के मामले में यह अवधि 30 वर्ष निर्धारित है।

क्या किराएदार भी कर सकता है दावा?

मकान मालिकों के लिए राहत की बात यह है कि एक ‘वैध किराएदार’ प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता। कानून के अनुसार, किराएदार मकान मालिक की अनुमति से उसकी संपत्ति में रहता है और यह अनुमति किराया अनुबंध (Rent Agreement) के रूप में दस्तावेजीकृत होती है। जब तक कब्जा स्वामी की सहमति से है, चाहे किराएदार 12 वर्ष रहे, 25 वर्ष या 50 वर्ष, वह प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता।

मकान मालिकों के लिए सुरक्षा टिप्स: इन बातों का रखें ध्यान

अपनी संपत्ति को किसी भी कानूनी विवाद से बचाने के लिए विशेषज्ञों ने निम्नलिखित सलाह दी है:

  1. 11 माह का रेंट एग्रीमेंट: प्रत्येक 11 माह पर किराया अनुबंध (Rent Agreement) का नवीनीकरण करवाएं। इसे नोटरी या पंजीकृत (Registered) जरूर कराएं।
  2. किराया रसीद: हर महीने किराया लेते समय लिखित रसीद दें। यह इस बात का कानूनी साक्ष्य है कि कब्जा आपकी स्वीकृति से है और व्यक्ति ‘किराएदार’ की हैसियत से रह रहा है।
  3. कानूनी परामर्श: यदि किराएदार बिना रेंट एग्रीमेंट के लंबे समय से रह रहा हो, तो तुरंत किसी विशेषज्ञ अधिवक्ता से परामर्श लें।

किराएदारों के भी हैं अपने अधिकार

कानून केवल मकान मालिक ही नहीं, बल्कि किराएदारों को भी संरक्षण देता है।

  • अचानक निष्कासन नहीं: किराएदार को बिना उचित कारण या नोटिस दिए अचानक घर से नहीं निकाला जा सकता। राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम जैसे कानूनों के अंतर्गत निष्कासन की प्रक्रिया न्यायालय के माध्यम से होनी चाहिए।
  • बुनियादी सुविधाएं: मकान मालिक जबरन कब्जा छुड़ाने के लिए बिजली-पानी काटना या ताला तोड़ने जैसे कदम नहीं उठा सकता। ऐसी स्थिति में किराएदार पुलिस या न्यायालय की शरण ले सकता है।
  • उचित किराया: किराए में मनमानी वृद्धि भी कानून सम्मत नहीं है।

नोट: यह समाचार सामान्य विधिक जागरूकता के लिए है। किसी भी विशिष्ट प्रकरण में हमेशा पेशेवर अधिवक्ता से कानूनी परामर्श लें।

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