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राजस्थान

Rajasthan Unique Holi: धुलंडी के अगले दिन यहां खेली जाती है होली, दौसा की डोलची परंपरा से कांप उठती है रूह

By The Public Hub
Last updated: March 2, 2026
4 Min Read

राजस्थान अपनी बहुरंगी संस्कृति और अनूठी परंपराओं के लिए विश्वभर में विख्यात है। यहाँ होली का पर्व भी अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। लेकिन दौसा जिले के महुवा उपखंड स्थित पावटा गांव की होली सबसे जुदा और रूह कंपा देने वाली है। यहाँ धुलंडी (मुख्य होली) के अगले दिन यानी ‘होली की दूज’ पर सदियों पुरानी ‘डोलची होली’ खेली जाती है। इसे देखने के लिए न केवल राजस्थान, बल्कि देश-विदेश से लोग पहुँचते हैं। इस होली को ‘खूनी होली’ के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें प्रहार इतने तेज होते हैं कि कमजोर दिल वाले इसे देख भी नहीं सकते।

कटे सिर के साथ लड़े थे बल्लू शहीद: परंपरा के पीछे की शौर्य गाथा

बुजुर्गों के अनुसार, यह अनूठी परंपरा हजारों सालों से ‘बल्लू शहीद’ (बल्लू सिंह) की याद में निभाई जा रही है। मान्यता है कि हजारों साल पहले दो समुदायों के बीच हुए आपसी झगड़े के दौरान पावटा गांव के वीर सपूत बल्लू सिंह का सिर काट दिया गया था। अकल्पनीय वीरता का परिचय देते हुए, वे बिना सिर के भी विपक्षी सेना से तब तक लड़ते रहे जब तक कि उन्होंने दुश्मन सेना का पूरी तरह खात्मा नहीं कर दिया। उनकी इसी अतुलनीय बहादुरी और बलिदान को नमन करने के लिए हर साल हदीरा मैदान में इस डोलची होली का आयोजन किया जाता है।

‘खूनी’ होली की खतरनाक तैयारियां: एक महीने पहले से तेल-हल्दी की मालिश

इस खतरनाक खेल में शामिल होने वाले युवाओं की तैयारियां एक महीने पहले ही शुरू हो जाती हैं। चूंकि डोलची (चमड़े के पात्र) से पीठ पर सीधे प्रहार किए जाते हैं, इसलिए युवा अपनी पीठ को मजबूत बनाने के लिए उस पर हल्दी एवं तेल की मालिश करवाते हैं। वहीं, चमड़े से बने विशेष पात्र, जिसे ‘डोलची’ कहते हैं, उसे भी 15 दिन पहले तेल पिलाना (तेल में भिगोना) शुरू कर दिया जाता है ताकि वह नरम रहे और प्रहार और अधिक घातक हो सके।Rajasthan Unique Holi: धुलंडी के अगले दिन यहां खेली जाती है होली, दौसा की डोलची परंपरा से कांप उठती है रूह

होली दूज के दिन पावटा गांव का हदीरा मैदान एक रणक्षेत्र में तब्दील हो जाता है। गुर्जर समाज के दो प्रमुख गोत्रों (दडगस और पीलवाड़) के युवा दो सेनाओं में बटकर आमने-सामने उतरते हैं। एक तरफ ‘पीलवाड़ पट्टी’ और दूसरी तरफ ‘जिंद पार्टी’। दोनों सेनाओं के हाथ में चमड़े की भारी डोलची और रंग-पानी से भरी बाल्टियाँ होती हैं। युवा एक-दूसरे की पीठ पर डोलची से पानी की इतनी तेज बौछारें मारते हैं कि उसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई देती है। इस दौरान पूरा मैदान ‘शहीद बल्लू सिंह’ के जयकारों से गूंज उठता है।

जब नहीं खेली होली, तो गांव में पड़ा भीषण अकाल

इस खतरनाक परंपरा को न तोड़ने के पीछे एक गहरा भय और लोकमान्यता भी छिपी है। बुजुर्ग बताते हैं कि एक बार किसी कारणवश गांव में डोलची होली का आयोजन नहीं किया गया था। इसके बाद पूरे गांव को भयंकर प्राकृतिक आपदाओं ने घेर लिया और गांव में अकाल पड़ गया। तब ग्रामीणों ने बल्लू शहीद के स्थान पर जाकर क्षमा मांगी और हर साल धूलंडी के अगले दिन अनवरत रूप से डोलची होली खेलने की शपथ ली। तब जाकर गांव को आपदाओं से मुक्ति मिली। तब से यह परंपरा बिना रुके चली आ रही है।

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