राजस्थान की भजनलाल सरकार ने प्रदेश में आगामी पंचायत और निकाय चुनावों से पहले एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए चुनाव लड़ने की योग्यता में बड़ा बदलाव किया है। अब राज्य में दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति भी सरपंच, पार्षद और अन्य स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के पात्र होंगे। उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा और कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने जानकारी दी कि कैबिनेट ने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 में संशोधन को मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद 31 साल पुरानी वह पाबंदी हट जाएगी, जिसके कारण कई सक्रिय उम्मीदवार चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते थे।
नियम बदलने की मुख्य वजह और जनसंख्या दर का तर्क
सरकार का कहना है कि दो से अधिक संतान होने पर चुनाव लड़ने का प्रतिबंध उस समय (1995) लागू किया गया था, जब जनसंख्या विस्फोट पर नियंत्रण की सख्त आवश्यकता थी। वर्ष 1991-94 के दौरान राजस्थान में प्रजनन दर 3.6 थी, जो वर्तमान में घटकर 2 रह गई है। मंत्रियों के अनुसार, इन प्रावधानों का प्रत्यक्ष प्रभाव अब समय के साथ कम होता जा रहा है। सरकार का मानना है कि जब जनसंख्या नियंत्रण के लक्ष्य काफी हद तक प्राप्त कर लिए गए हैं, तो इस पुरानी बाध्यता को जारी रखना प्रासंगिक नहीं रह गया है।
सांसद-विधायकों के समान अवसर देने की मांग
इस नियम को हटाने की मांग लंबे समय से की जा रही थी। जनप्रतिनिधियों और नेताओं का तर्क था कि जब विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है, तो स्थानीय चुनावों में यह भेदभाव क्यों? हाल ही में सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन में भी इस शर्त को हटाया जा चुका है। इन्हीं तथ्यों को आधार बनाकर सरकार ने तय किया कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं को समान अवसर मिलने चाहिए। उल्लेखनीय है कि 1995 में भैरोंसिंह शेखावत सरकार के समय यह रोक लगाई गई थी, जिसे अब वर्तमान विधानसभा सत्र में विधेयक पारित कराकर समाप्त किया जाएगा।
