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धर्म

Ekadashi Vrat Rules: आमलकी एकादशी पर पारण का क्या है महत्व? हरि वासर में भूलकर भी न खोलें व्रत

By The Public Hub
Last updated: February 26, 2026
2 Min Read

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जो आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह पवित्र तिथि महाशिवरात्रि और होली के त्योहारों के मध्य आती है और अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार वर्तमान में यह फरवरी या मार्च के महीने में पड़ती है। एकादशी के व्रत को विधि-विधान से पूर्ण करने के बाद इसे खोलना ‘पारण’ कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अनिवार्य है। यदि कोई श्रद्धालु द्वादशी तिथि के भीतर पारण नहीं करता है, तो उसे पाप का भागी माना जाता है।

व्रत खोलने के समय में ‘हरि वासर’ की अवधि का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है, और इस दौरान व्रत तोड़ना वर्जित माना गया है। श्रद्धालुओं को व्रत खोलने के लिए हरि वासर के समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। पारण के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता है, जबकि मध्याह्न (दोपहर) के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। यदि किसी अनिवार्य कारण से सुबह पारण संभव न हो, तो मध्याह्न के बाद ही इसे संपन्न करना चाहिए।

कभी-कभी एकादशी का व्रत लगातार दो दिनों तक पड़ जाता है, ऐसी स्थिति में नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण है। जब एकादशी दो दिन की होती है, तब सामान्य गृहस्थों या स्मार्त परिवारजनों को पहले दिन व्रत करना चाहिए। दूसरे दिन वाली एकादशी को ‘दूजी एकादशी’ कहा जाता है, जिसे संन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष की कामना रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए निर्धारित किया गया है। विशेष परिस्थितियों में दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन पड़ती हैं। भगवान विष्णु के अनन्य भक्त, जो उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

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