Friday, March 20, 2026
जयपुरमरुधरा में आस्था का 'शीतल' पर्व: 11 मार्च को मनेगा बासोड़ा, चूल्हों पर लगेगा विश्राम, जानें क्यों चढ़ाया जाता है माता को ठंडा भोग

मरुधरा में आस्था का ‘शीतल’ पर्व: 11 मार्च को मनेगा बासोड़ा, चूल्हों पर लगेगा विश्राम, जानें क्यों चढ़ाया जाता है माता को ठंडा भोग

जयपुर: होली के ठीक आठ दिन बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी को उत्तर भारत, विशेषकर राजस्थान में ‘शीतला अष्टमी’ का पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसे आम बोलचाल में ‘बास्योड़ा’ भी कहते हैं। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता और पूरा परिवार एक दिन पहले बना ठंडा भोजन (बासी भोजन) ही ग्रहण करता है।


शीतला अष्टमी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथियां (Table)

पर्वतिथिदिन
शीतला सप्तमी (भोजन पकाने का दिन)10 मार्च 2026मंगलवार
शीतला अष्टमी (पूजा और बास्योड़ा)11 मार्च 2026बुधवार
अष्टमी तिथि प्रारंभ10 मार्च 2026रात 10:15 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त11 मार्च 2026रात 11:45 बजे तक

क्यों मनाया जाता है यह पर्व? (पौराणिक एवं धार्मिक मान्यता)

देवी शीतला को ‘आरोग्य की देवी’ माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता शीतला का स्वरूप अत्यंत शीतल है। उनके हाथों में कलश (ठंडे जल का प्रतीक), झाड़ू (स्वच्छता का प्रतीक) और नीम के पत्ते (औषधि का प्रतीक) होते हैं।

  • रोगों से मुक्ति: मान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने से बच्चों को चेचक (स्मॉलपॉक्स), खसरा (मीजल्स) और आंखों की बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।
  • ठंडक का वरदान: ‘शीतला’ शब्द का अर्थ ही ‘शीतलता प्रदान करने वाली’ है। लोग परिवार में सुख, शांति और शीतलता बनाए रखने के लिए यह व्रत रखते हैं।

वैज्ञानिक आधार: मौसम परिवर्तन और खान-पान

बास्योड़ा का पर्व ऋतु परिवर्तन (Spring to Summer) के समय आता है।

  1. गर्मी का आगमन: इस समय से गर्मी बढ़ना शुरू हो जाती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस बदलते मौसम में शरीर को अंदरूनी ठंडक की जरूरत होती है।
  2. चूल्हा न जलाने का तर्क: एक दिन चूल्हा न जलाकर रसोई और घर को पूरी तरह साफ किया जाता है, जो स्वच्छता का संदेश देता है।
  3. खमीर युक्त भोजन: बास्योड़ा में दही, राबड़ी और ओलिया जैसे खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं। ये प्रोबायोटिक से भरपूर होते हैं जो बढ़ती गर्मी में पाचन तंत्र को दुरुस्त रखते हैं।

चाकसू का प्रसिद्ध मेला: राजस्थान की खास पहचान

राजस्थान में शीतला अष्टमी का सबसे बड़ा केंद्र जयपुर के पास चाकसू (शील की डूंगरी) है। यहाँ माता का प्राचीन मंदिर है जहाँ गधों का प्रसिद्ध मेला भी लगता है। गधे को माता शीतला का वाहन माना जाता है। यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं और माता को राबड़ी, बाजरे की रोटी, गुड़, और ठंडे पकवानों का भोग लगाते हैं।


कैसे करें पूजा? (विस्तृत विधि)

  • सप्तमी (10 मार्च): इस दिन मीठे चावल, पुए, पकोड़ी, राबड़ी और ओलिया तैयार कर लें।
  • अष्टमी (11 मार्च): सुबह जल्दी उठकर ठंडे जल से स्नान करें।
  • पूजन: माता के मंदिर जाकर या घर पर ही उनकी पूजा करें। उन्हें बासी भोजन का भोग लगाएं।
  • बड़कुल्ले: महिलाएं गोबर से बने ‘बड़कुल्लों’ (छोटा हार) की भी पूजा करती हैं।
  • जल चढ़ाना: पूजा के बाद उस जल को आंखों पर लगाएं और घर के हर कोने में छिड़कें, इसे सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

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