Sunday, March 22, 2026
राजस्थानपॉक्सो कानून और किशोरों की सहमति: राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द किया 19 साल के युवक पर केस, केंद्र को कानून में संशोधन की दी सलाह

पॉक्सो कानून और किशोरों की सहमति: राजस्थान हाईकोर्ट ने रद्द किया 19 साल के युवक पर केस, केंद्र को कानून में संशोधन की दी सलाह

जोधपुर, राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिगों से संबंधित यौन अपराधों (पॉक्सो) के मामलों पर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि मौजूदा कानूनी ढांचे में ‘यौन शोषण’ और ‘आपसी सहमति’ से बने किशोर संबंधों के बीच फर्क करना जरूरी है। जस्टिस अनिल उपमन की पीठ ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि पॉक्सो कानून में ‘रोमियो-जूलियट’ (सहमति वाले संबंधों को अपराध से अलग रखने) जैसा प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए।

क्यों पड़ी इस टिप्पणी की जरूरत?

अदालत एक 19 वर्षीय युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में:

  • एक 17 वर्षीय किशोरी ने कोर्ट और पुलिस को दिए बयानों में स्पष्ट कहा कि वह अपनी मर्जी से गई थी।
  • मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन शोषण की पुष्टि नहीं हुई थी।
  • इसके बावजूद पुलिस और ट्रायल कोर्ट ने ‘मशीनी’ ढंग से काम करते हुए चार्ज फ्रेम कर दिए थे।

अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ:

“कानून बच्चों को यौन शिकारियों से बचाने के लिए बना था, न कि उन युवाओं को परेशान करने के लिए जो सामाजिक रूप से अस्वीकार्य लेकिन आपसी सहमति वाले रिश्तों में हैं।”

  • सहमति को नजरअंदाज करना: कोर्ट ने कहा कि 2012 से पहले ऐसे मामले अपराध नहीं माने जाते थे, लेकिन अब 16 से 18 वर्ष के बीच के किशोरों के ‘कमिटेड रिलेशनशिप’ को भी गंभीर अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
  • अपराधियों की बढ़ती संख्या: कोर्ट ने चिंता जताई कि देशभर में पॉक्सो के मामलों का एक बड़ा हिस्सा इसी ‘रोमियो-जूलियट’ प्रकृति का है, जहां उम्र के तकनीकी अंतर के कारण युवाओं का भविष्य बर्बाद हो रहा है।

बढ़ते आंकड़ों पर चिंता

रिपोर्ट के अनुसार, 2012 में लागू हुए पॉक्सो कानून के तहत मामलों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। साल 2017 में जहां 33,210 मामले दर्ज थे, वहीं 2022 तक यह संख्या दोगुनी से अधिक हो गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पीड़िता खुद आरोपी को बेगुनाह बता रही हो, तो अदालत अपनी आंखें नहीं मूंद सकती।

न्यायालय का आदेश: हाईकोर्ट ने युवक के खिलाफ दर्ज एफआईआर और ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है। अदालत का यह रुख भविष्य में सहमति वाले किशोर संबंधों से जुड़े कानूनी विवादों के लिए एक नई दिशा तय कर सकता है।

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