Friday, March 20, 2026
राजधानी'लोक कला संगम 2026': ब्रज की होली और बम रसिया से गुलाल हुआ शिल्पग्राम; साहित्य और हस्तशिल्प का भी अनूठा संगम

‘लोक कला संगम 2026’: ब्रज की होली और बम रसिया से गुलाल हुआ शिल्पग्राम; साहित्य और हस्तशिल्प का भी अनूठा संगम

जयपुर: गुलाबी नगरी के सांस्कृतिक हृदय स्थल जवाहर कला केंद्र (JKK) का शिल्पग्राम शुक्रवार को मरुधरा की सतरंगी लोक संस्कृति के रंगों में सराबोर हो गया। मौका था अखिल भारतीय संस्कार भारती और राजस्थान पर्यटन, कला एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय भव्य उत्सव ‘लोक रंग से उजास: कला संगम-2026’ के शुभारंभ का। शुक्रवार को हुए इस रंगारंग आगाज ने पहले ही दिन दर्शकों को राजस्थानी माटी की सौंधी खुशबू और कलात्मक विरासत से रूबरू करवाया। कार्यक्रम की शुरुआत मांगलिक वंदना और कलाकारों के समवेत स्वरों के साथ हुई, जिसने शिल्पग्राम के माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंच पर हण्डु पहलवान और जगत सिंह सुंदरावली ने जब ‘गौ-महिमा’ और कृष्ण भजनों की स्वरलहरियां छेड़ीं, तो वहां मौजूद हर श्रोता भक्ति भाव में डूब गया। इसके तुरंत बाद डीग (भरतपुर) से आए विष्णु शर्मा और उनके दल ने ब्रज की प्रसिद्ध ‘फूलों की होली’ और ‘चरकुला नृत्य’ प्रस्तुत कर माहौल में फाल्गुनी बयार बहा दी। महुआ के श्री कृष्ण गुर्जर एंड पार्टी के ‘लांगुरिया’ गीतों और जगत सिंह के ‘बम रसिया’ की थाप पर दर्शक अपनी कुर्सियों से उठकर थिरकने को मजबूर हो गए।

शिल्पग्राम के इस मेले में केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की ही धूम नहीं है, बल्कि यह कला, साहित्य और सेहत का भी एक अनूठा संगम बन गया है। लोक कला संगम में हस्तशिल्प कला (Handicrafts) और चित्रकारी की विशेष प्रदर्शनी लगाई गई है, जो आगंतुकों को राजस्थान की हुनरमंद विरासत से परिचित करा रही है। वहीं, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक जयपुरवासियों के लिए आयुर्वेद की प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इसके अतिरिक्त, साहित्य प्रेमियों के लिए ‘ज्ञान गंगा प्रकाशन’ की ओर से विशेष पुस्तक स्टॉल लगाई गई है, जहां पाठक भारतीय संस्कृति और साहित्य से जुड़ी ज्ञानवर्धक पुस्तकों का लाभ उठा रहे हैं।

मनोरंजन के साथ-साथ यह उत्सव बौद्धिक विमर्श का भी केंद्र बना रहा। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के समानांतर आयोजित ‘लोक चौपाल’ में नई पीढ़ी को लोक जीवन की वैज्ञानिकता से जोड़ने का प्रयास किया गया। मुख्य संयोजक निधीश गोयल ने ‘लोक’ और अंग्रेजी शब्द ‘Folk’ के बीच के सूक्ष्म दार्शनिक अंतर को स्पष्ट करते हुए भारतीय दृष्टि को परिभाषित किया। प्रथम सत्र में डॉ. इंदु शेखर ‘तत्पुरुष’, डॉ. विवेक भटनागर और डॉ. तनुजा सिंह ने भारतीय लोक दृष्टि पर गहन विचार साझा किए। वहीं, दूसरे सत्र में नारायण सिंह राठौड़ ‘पीथल’, डॉ. गीता सामोर और तनेराज सिंह सोढ़ा ने लोक परंपराओं पर मंथन किया। वीकेंड होने के चलते शनिवार और रविवार को उत्सव में और अधिक भीड़ उमड़ने की संभावना है।

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