Saturday, March 21, 2026
राजस्थानMahashivratri Special: झरनेश्वर महादेव का चमत्कार! कुण्ड का पानी कभी नहीं होता खत्म, शहर में सबसे पहले यहीं होती है आरती

Mahashivratri Special: झरनेश्वर महादेव का चमत्कार! कुण्ड का पानी कभी नहीं होता खत्म, शहर में सबसे पहले यहीं होती है आरती

अजमेर: महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मरुधरा शिव भक्ति के रंग में रंगी हुई है। इस खास मौके पर हम आपको राजस्थान के एक ऐसे ऐतिहासिक और चमत्कारी शिवालय के बारे में बताने जा रहे हैं, जो न केवल अपनी प्राचीनता बल्कि अपने अनोखे स्वरूप और रहस्यों के लिए भी जाना जाता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहां देवाधिदेव महादेव अपने रौद्र या वयस्क रूप में नहीं, बल्कि मासूम ‘बाल रूप’ में श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं।

हम बात कर रहे हैं अजमेर जिले में अरावली पर्वतमाला की गोद में बसे ‘झरनेश्वर महादेव मंदिर’ की। करीब 600 साल पुराना यह मंदिर आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान से जुड़ा है इतिहास

झरनेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना मराठा काल में की गई थी। किंवदंतियों के अनुसार, अजमेर के महान शासक सम्राट पृथ्वीराज चौहान भी इस पवित्र स्थल पर आकर भगवान शिव की आराधना किया करते थे। इस मंदिर का नाम ‘झरनेश्वर’ पड़ने के पीछे भी एक प्राकृतिक कारण है। यहाँ पहाड़ों के बीच से एक बरसाती झरना बहता है, जिसके कारण इसे यह नाम मिला।

बाल रूप की महिमा: जितनी बार पूजा, उतनी बार नया शृंगार

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहाँ विराजित शिवलिंग का स्वरूप है। यहाँ भोलेनाथ बाल रूप में विराजमान हैं। इस बाल स्वरूप के कारण ही यहाँ की पूजा पद्धति भी अन्य मंदिरों से अलग है:

  1. सबसे पहली पूजा: जिस तरह घर में सबसे पहले बच्चों का ध्यान रखा जाता है, उसी तरह मान्यता है कि अजमेर शहर में प्रतिदिन सबसे पहली पूजा-अर्चना झरनेश्वर महादेव मंदिर में ही शुरू होती है।
  2. अनोखा शृंगार: यहाँ भगवान के बाल रूप के चलते दिन में जितनी बार पूजा की जाती है, उतनी ही बार महादेव का अलग-अलग और नया शृंगार किया जाता है।

चमत्कारी कुंड: स्वतः ऊपर आ जाता है पानी

यह प्राचीन मंदिर एक गहरे रहस्य को भी अपने में समेटे हुए है। यहाँ एक प्राकृतिक जल कुंड है, जिसमें साल भर पहाड़ियों से रिसकर पानी एकत्र होता रहता है। इस कुंड का चमत्कार यह है कि इसका पानी कभी खत्म नहीं होता। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के अनुसार, जब भी कुंड का जलस्तर कम होने लगता है, वह अपने आप ही ऊपर आ जाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा करता है।

आधा किलोमीटर की ट्रैकिंग कर पहुँचते हैं भक्त

प्रकृति की गोद में बसा यह मंदिर श्रद्धालुओं को एक अलग ही सुकून देता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए भक्तों को करीब आधा किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय करना पड़ता है। यह छोटी सी ट्रैकिंग भक्तों के उत्साह को और बढ़ा देती है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर इस ऐतिहासिक मंदिर में विशेष सजावट की जाती है और दूर-दूर से श्रद्धालु भोलेनाथ के इस अनोखे बाल रूप के दर्शन करने और चमत्कारी कुंड को देखने के लिए यहाँ उमड़ते

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