अक्सर हम बच्चों की शैतानी या उनके गुस्से को ‘बचपना’ कहकर टाल देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वही बच्चा अंदर ही अंदर अवसाद (Depression) से जूझ रहा हो सकता है? बच्चों में डिप्रेशन बड़ों की तुलना में बिल्कुल अलग तरीके से व्यवहार करता है। जहाँ बड़े अपनी उदासी साझा कर सकते हैं, वहीं बच्चे इसे चिड़चिड़ेपन और व्यवहारिक बदलावों के पीछे छिपा लेते हैं।
चाइल्ड डिप्रेशन: 4 बड़े संकेत जो माता-पिता को नजरअंदाज नहीं करने चाहिए
डॉ. ने उन बारीक बदलावों को रेखांकित किया है जो एक बच्चे की मानसिक पीड़ा का संकेत देते हैं:
- व्यवहार का ‘यू-टर्न’: बच्चा अचानक उन खेलों या खिलौनों से नफरत करने लगे जो उसे पहले बहुत पसंद थे। वह गुमसुम रहने लगे या छोटी सी बात पर फूट-फूट कर रोने लगे।
- रहस्यमयी शारीरिक दर्द: बिना किसी मेडिकल कारण के बार-बार पेट दर्द, सिरदर्द या अत्यधिक थकान की शिकायत करना। डॉ. गुप्ता के अनुसार, मानसिक तनाव अक्सर बच्चों में शारीरिक लक्षणों के रूप में बाहर आता है।
- एकाग्रता और पढ़ाई में गिरावट: अचानक स्कूल जाने से डरना, क्लास में ध्यान न लगा पाना या होमवर्क में पिछड़ना। इसे ‘आलस’ समझने की गलती न करें, यह मानसिक संघर्ष का नतीजा हो सकता है।
- नकारात्मक आत्म-चर्चा: यदि बच्चा कहे कि “मैं अच्छा नहीं हूँ” या “मुझे कोई पसंद नहीं करता”, तो यह उसके गिरते आत्मविश्वास और अपराधबोध का सबसे गंभीर संकेत है।
क्यों टूट रहे हैं नन्हे मन?
अध्ययन बताते हैं कि 15 से 19 वर्ष का आयु वर्ग सबसे ज्यादा जोखिम में है। इसके पीछे के प्रमुख कारण पारिवारिक कलह, स्कूल में बुलिंग, पढ़ाई का भारी बोझ या किसी प्रियजन का बिछड़ना हो सकते हैं। डॉ. का कहना है कि अगर समय पर इस ‘खामोश बीमारी’ को पहचान लिया जाए, तो सही काउंसिलिंग और ट्रीटमेंट से बच्चा फिर से पहले जैसा खिलखिला सकता है।
