जैसलमेर | राजस्थान के जैसलमेर जिले में शिक्षा के मंदिर और भावी शिक्षकों को गढ़ने वाले जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) से एक बड़ा प्रशासनिक स्कैंडल सामने आया है। ‘The Public Hub’ की विशेष पड़ताल के अनुसार, डाइट प्रशासन ने नियमों को ताक पर रखकर कागजों में ऐसा खेल खेला है जिसने विभाग की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी (CDEO) लालचंद नहलिया ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए डाइट प्रधानाचार्य के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और कई संगीन बिंदुओं पर जवाब तलब किया है।
नियमों को ठेंगा: छुट्टी पर भी ‘भौतिक उपस्थिति’ का चमत्कार \
CDEO द्वारा जारी नोटिस में सबसे चौंकाने वाला खुलासा प्रधानाचार्य की उपस्थिति को लेकर हुआ है। जांच में सामने आया है कि जिस अवधि में डाइट प्रधानाचार्य ‘परिवर्तित अवकाश’ (Commuted Leave) पर थे और आधिकारिक रूप से मुख्यालय से बाहर थे, उसी दौरान शोध कार्यों की फाइलों पर उनके भौतिक हस्ताक्षर (Physical Signature) पाए गए। सवाल यह है कि यदि प्रधानाचार्य छुट्टी पर थे, तो उन्होंने भौतिक रूप से उपस्थित होकर फाइलों पर हस्ताक्षर कैसे किए?
फाइलों में ‘समय यात्रा’: आदेश से पहले ही शुरू हो गई ट्रेनिंग
इस प्रशासनिक स्कैंडल में ‘समय यात्रा’ (Backdated Entries) का एक और हैरतअंगेज मामला सामने आया है। रिकॉर्ड के अनुसार, 34 कार्मिकों के ऑनलाइन आदेश जनवरी 2026 में जनरेट हुए थे। लेकिन कागजों का घालमेल देखिए—इनमें से 3 शोधार्थियों की प्रशिक्षण अवधि दिसंबर 2025 की दर्ज कर दी गई है। शिक्षा विभाग के गलियारों में चर्चा है कि आदेश जारी होने से एक महीने पहले ही ट्रेनिंग शुरू हो जाना सीधे तौर पर फर्जीवाड़े की ओर इशारा करता है।
अस्तित्वहीन प्रभाग में ड्यूटी: पद का खुला दुरुपयोग
फर्जीवाड़े की हद तो तब हो गई जब डाइट में एक ऐसे विभाग में ड्यूटी लगा दी गई जो वहां मौजूद ही नहीं है। जांच के अनुसार, डाइट में ‘हिंदुस्तान स्काउट एवं गाइड’ का कोई प्रभाग (Department) अस्तित्व में नहीं है, फिर भी एक शिक्षिका की ड्यूटी इस नाम पर लगा दी गई। इसे नियमों का खुला उल्लंघन और पद का दुरुपयोग माना जा रहा है। इसके अलावा, शोध कार्य में लगाए गए अन्य कार्मिकों की प्रशिक्षण पूर्व की अवधि में भी भारी विसंगतियां पाई गई हैं।
क्या गिरेगी गाज? विभाग में हड़कंप
CDEO लालचंद नहलिया ने इन सभी अनियमितताओं पर प्रधानाचार्य से स्पष्टीकरण मांगा है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल कागजी लापरवाही है या इसके पीछे कोई बड़ा वित्तीय भ्रष्टाचार छिपा है? आखिर किसके संरक्षण में बैक-डेट में हाजिरी और फर्जी नियुक्तियों का यह खेल चल रहा था? सूत्रों की मानें तो संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर कई बड़े अधिकारियों पर गाज गिरना तय है।
