Sunday, March 22, 2026
अजमेरRPSC vs UPSC: केंद्र में 12 महीने में नौकरी, राजस्थान में 30 महीने का इंतजार; खाली पदों ने बढ़ाई अभ्यर्थियों की चिंता

RPSC vs UPSC: केंद्र में 12 महीने में नौकरी, राजस्थान में 30 महीने का इंतजार; खाली पदों ने बढ़ाई अभ्यर्थियों की चिंता

अजमेर |

राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) में आने वाले पांच महीने बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। एक ओर जहां आयोग के पास मार्च से नवंबर तक परीक्षाओं का अंबार लगा है, वहीं दूसरी ओर परीक्षा कराने वाले ‘हाथों’ की संख्या लगातार कम होती जा रही है। अगस्त 2026 तक आयोग में अध्यक्ष सहित तीन और सदस्य सेवानिवृत्त हो जाएंगे, जिससे भर्ती प्रक्रिया के पूरी तरह पटरी से उतरने का खतरा पैदा हो गया है।

अगस्त तक रह जाएंगे सिर्फ 4 सदस्य: रिक्तियों का गणित

आयोग में कुल 10 पद (अध्यक्ष सहित) स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 6 सदस्य ही कार्यरत हैं। इनमें से भी अगले कुछ महीनों में महत्वपूर्ण पद खाली होने वाले हैं:

  • उत्कल रंजन (अध्यक्ष): 12 जून 2026 को कार्यकाल समाप्त।
  • के.सी. मीणा (सदस्य): 8 जुलाई 2026 को सेवानिवृत्ति।
  • डॉ. अशोक कलवार (सदस्य): 31 जुलाई 2026 को कार्यकाल पूरा।
  • बाबूलाल कटारा (निलंबित सदस्य): 14 अगस्त 2026 को कार्यकाल समाप्त।

अगस्त के बाद आयोग में केवल प्रो. अयूब खान, लेफ्टिनेंट कर्नल केसरी सिंह, प्रो. सुशील बिस्सू और हेमंत प्रियदर्शी ही शेष रह जाएंगे। सदस्यों की इस भारी कमी का सीधा असर साक्षात्कार (Interview), विभागीय पदोन्नति (DPC) और परीक्षा आयोजन पर पड़ेगा।

UPSC के मुकाबले कछुआ चाल

आयोग की कार्यप्रणाली की तुलना जब संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) से की जाती है, तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जहाँ UPSC अपनी अधिकांश बड़ी भर्तियां (IAS, NDA, CDS) 6 से 12 महीने में पूरी कर लेता है, वहीं RPSC में यह समय 15 से 30 महीने तक खिंच जाता है। आरएएस (RAS) 2023 और 2024 इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहाँ प्रक्रिया दो-दो साल से लंबित है।

इन परीक्षाओं पर मंडराया संकट

आगामी महीनों में आयोग को सहायक अभियंता, सब इंस्पेक्टर, वरिष्ठ अध्यापक, सांख्यिकी अधिकारी और प्रोटेक्शन अधिकारी जैसी दर्जनों महत्वपूर्ण परीक्षाएं आयोजित करनी हैं। सदस्यों की कमी से इन परीक्षाओं की तिथियों में बदलाव या परिणाम घोषित करने में भारी देरी की आशंका बढ़ गई है।

देरी के प्रमुख कारण:

  • पेपर लीक विवाद: बार-बार पेपर लीक होने से परीक्षाओं का पुन: आयोजन।
  • सदस्यों की कमी: कोरम पूरा न होने से निर्णय लेने में देरी।
  • कानूनी अड़चनें: नियुक्तियों और परीक्षाओं का बार-बार कोर्ट में फंसना।

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